जुनून: इतिहास की परतें खोल सभ्यताओं से रूबरू करा रहे इलाहाबाद के अर्श अली

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 01 Jul 2018 11:11 AM IST
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अर्श अली
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मिस्र बौद्ध धर्म कोई ऐसा विषय नहीं है जिसमें किसी 17 साल के बच्चे की दिलचस्पी हो। लेकिन अर्श अली के लिए यह एक विषय ऐसा है जिसपर वह पिछले कुछ सालों से लगातार काम कर रहे हैं। उन्होंने हाल ही में विश्व व्याख्यान श्रृंखला में भारत के राष्ट्रीय संग्रहालयों पर बातचीत की थी। जहां एक तरफ उनकी उम्र के टीनेजर बच्चे अपना समय सोशल मीडिया पर गुजारते हैं। वहीं अली खुदाई और मिट्टी में समय बिताते हैं।
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इलाहाबाद के रहने वाले अली केवल 15 साल के थे जब उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के साथ राजस्थान के बिंजोर में हड़प्पा साइट पर पहली खुदाई की थी। दूसरी बार उन्होंने डेक्कन कॉलेज के डॉक्टर वसंत शिेंदे के नेतृत्व में सिंधु घाटी की साइट पर खुदाई की। इस समय वो वेदों को प्राचीन मिस्र लेखन प्रणाली चित्रलिपी में बदल रहे हैं। अली ने कहा, जब मैं 2 साल का था तब मैंने चित्रलिपी पढ़नी शुरू की थी। इसमें लाखों चिह्न हैं इसलिए आपको व्याकरण का पता होना चाहिए। 
राष्ट्रीय संग्रहालय के महानिदेशक डॉक्टर बीआर मणि जिन्होंने अली को विश्व व्याख्यान श्रृंखला में आमंत्रित किया था उन्होंने उसे एक अद्भुत बालक बताया है। उन्होंने कहा, 'मेरी अर्श से मुलाकात साल 2015 में गुवाहाटी में हुए एक सेमिनार के दौरान हुई। मैं उससे बहुत जल्दी प्रभावित हो गया क्योंकि उसने इतनी छोटी सी उम्र में खुदाई, इतिहास और कला के विभिन्न क्षेत्रों में काम किया था। वह शायद भारत का पहला शख्स होगा जिसे कि चित्रलिपी की लिखाई आती है।'
अली को जापानी मिट्टी के बर्तनों से लेकर बायोलॉजी तक आकर्षित करती है। अली साल 2016 से ओपन स्कूल से पढ़ाई कर रहे हैं जो उन्हें अपनी रुचियों को आगे बढ़ाने का मौका देती हैं। उन्होंने कहा, 'एक ऐसा चरण आया जब मैं अपनी अतिरिक्त पाठयक्रम गतिविधियों की वजह से क्लास में फेल होने लगा और मुझे स्कूल में उपस्थिति की परेशानी होने लगी।' इस साल अली बौद्ध साइटों का दौरा करने में व्यस्त हैं। जिसमें भारत के सांची और सुपारा और मिस्र के कायरो और सक्कारा शामिल हैं। वह इन दौरों के जरिए शासक अशोक और बौद्ध धर्म के मिस्र और यूनान में विस्तार के बीच की कड़ी को स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।

बौद्ध चिह्न धर्मचक्र का मिस्र के मकबरों में मिलने की वजह से उनका ध्यान इस तरफ गया। जहां अन्य विशेषज्ञों द्वारा इसे एक विसंगति के रूप में देखा गया, वहीं अली को लगा कि इसमें कुछ तो जरूर है। उ्नहोंने कहा, 'इस सबूत से यह साफ हो जाता है कि मिस्र में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अशोक ने दूत भेजे थे। मैं इससे जुड़ी दो या तीन कड़ी चाहता था लेकिन मुझे 50-80 मिल गईं।' अपनी मिस्र यात्रा के दौरान उन्हें भारतीय मिर्च और मिट्टी के बर्तनों पर ब्रह्मी शिलालेख के सबूत भी मिले।
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