हाथरस से सबक: पीड़िता की शिकायत पर दर्ज नहीं की एफआईआर तो सजा, दो माह में पूरी हो जांच

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 11 Oct 2020 01:35 AM IST
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हाथरस मामला- गांव में तैनात पुलिसबल
हाथरस मामला- गांव में तैनात पुलिसबल - फोटो : अमर उजाला

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सार

  • केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जारी की तीन पन्नों की एडवाइजरी
  • फोरेंसिक जांच के लिए साक्ष्य जुटाने में किट और अपराधियों का डाटाबेस का इस्तेमाल जरूरी होगा

विस्तार

देश को झकझोर देने वाली हाथरस की बिटिया के साथ हुई हैवानियत समेत महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों से चिंतित केंद्रीय गृह मंत्रालय ने शनिवार को सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को एडवाइजरी जारी की है। इसके मुताबिक, यौन अपराधों जैसे संज्ञेय मामलों में एफआईआर अनिवार्य रूप से दर्ज हो। अगर कोई सरकारी कर्मचारी एफआईआर दर्ज करने में नाकाम रहता है तो उसे सजा दी जाए। साथ ही दुष्कर्म के मामलों में पुलिस जांच हर हाल में दो महीने में पूरी की जाए।
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गृह मंत्रालय द्वारा जारी तीन पन्नों की एडवाइजरी में कहा गया है कि महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ होने वाले अपराधों से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने कानूनी प्रावधानों को और मजबूत बनाया है। केंद्र ने समय-समय पर राज्यों के लिए कई एडवाइजरी जारी की हैं, ताकि पुलिस यौन हमलों समेत महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के मामलों में सख्त कार्रवाई कर सके। इन कार्रवाइयों में एफआईआर दर्ज करने, फोरेंसिक जांच के लिए साक्ष्य जुटाने और यौन हमला साक्ष्य संग्रह (एसएईसी) किट, दो महीने में जांच पूरी करने और यौन अपराधियों का राष्ट्रीय डाटाबेस का अनिवार्य इस्तेमाल शामिल हैं। डाटाबेस से यौन अपराधियों की पहचान करने और ऐसे अपराधी द्वारा बार-बार किए जा रहे यौन अपराध पर भी नजर रखी जा सकेगी।
जीरो एफआईआर भी दर्ज करें
सीआरपीसी की धारा 154 की उपधारा (1) के तहत संज्ञेय अपराधों के मामलों में एफआईआर अनिवार्य रूप से दर्ज हो। कानून के मुताबिक, महिलाओं के खिलाफ यौन हमलों समेत संज्ञेय अपराधों में पुलिस को एफआईआर या जीरो एफआईआर (अपने थानाक्षेत्र के बाहर हुई घटना के मामले में) भी दर्ज करना होगा।

आईपीसी के तहत सजा
यौन अपराधों से जुडे़ सभी संज्ञेय अपराध के मामले मेें एफआईआर दर्ज करने में अगर कोई सरकारी कर्मचारी विफल रहता है तो आईपीसी की धारा 166 के तहत उसे सजा दिए जाने का प्रावधान है।

जांच की प्रगति पर पोर्टल से रखें नजर
सीआरपीसी की धारा 173 के तहत दुष्कर्म के मामलों में दो महीनों में जांच पूरी की जानी चाहिए। इस सिलसिले में गृह मंत्रालय ने इनवेस्टिगेशन ट्रैकिंग सिस्टम फॉर सेक्सुअल ऑफेंसेज (आईटीएसएसओ) नाम से एक ऑनलाइन पोर्टल भी बनाया है जहां ऐसे मामलों की प्रगति पर नजर रखी जा सकती है।

24 घंटे में पीड़िता का हो परीक्षण
सीआरपीसी की धारा 164-ए के तहत यौन हमले या दुष्कर्म पीड़िता का परीक्षण अपराध की सूचना मिलने के 24 घंटे के भीतर सहमति से किसी रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर से कराया जाना चाहिए।

मृत्यु पूर्व बयान अहम, भले ही मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज न हुआ हो
भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 (1) के तहत मृतका का लिखित या मौखिक बयान एक अहम तथ्य के तौर पर माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के पुरुषोत्तम चोपड़ा बनाम दिल्ली सरकार मामले में सात जनवरी, 2020 के एक आदेश के मुताबिक, मरने के पहले का दिया गया बयान न्यायिक जांच के लिए सभी जरूरतों को पूरा करता है। इसे इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता है कि ऐसे बयान को मजिस्ट्रेट या किसी पुलिस अफसर के बयान के सामने रिकॉर्ड नहीं किया गया।

साक्ष्यों को जुटाने, संग्रह करने या संभालने के लिए प्रशिक्षण
यौन हमलों के मामलों में जांच अधिकारियों या चिकित्सा अधिकारियों के लिए फोरेंसिक साक्ष्य जुटाने, सुरक्षित रखने और उसे ले जाने के संबंध में गृह मंत्रालय के तहत फोरेंसिक विज्ञान सेवा महानिदेशालय ने दिश-निर्देश जारी किए हैं। ऐसे मामलों की जांच के लिए सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की पुलिस को यौन हमला साक्ष्य संग्रह (एसएईसी) किट्स दी गई हैं। हर यौन हमला मामले में इस किट का इस्तेमाल अनिवार्य रूप से हो। जांच में लगे अधिकारियों, पुलिस को साक्ष्य जुटाने, संरक्षित करने और उसे संभालने का नियमित तौर पर प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए।

खामी पाए जाने पर जिम्मेदार अधिकारियों पर तत्काल सख्त कार्रवाई
कानूनी तौर पर सख्त प्रावधानों और क्षमता बढ़ाने के उपायों के बावजूद पुलिस की ओर से अगर इन अनिवार्य आवश्यकताओं का पालन नहीं किया जाता है तो यह देश में आपराधिक न्याय देने को प्रभावित कर सकता है। खास तौर पर महिला सुरक्षा के मामले में। ऐसी खामी संज्ञान में आती है तो इनकी जांच हो और जिम्मेदार संबंधित अधिकारियों के खिलाफ तत्काल सख्त कार्रवाई की जाए।

...ताकि समय पर दोषी के खिलाफ आरोपपत्र तैयार किया जा सके
राज्य और केंद्रशासित प्रदेश सभी संबंधित अधिकारियों को इस बारे में जरूरी दिशा-निर्देश जारी कर सकते हैं, ताकि इन नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित हो सके। ऐसे सभी मामलों की प्रगति की ऑनलाइन पोर्टल के जरिये निगरानी भी रखी जाए, ताकि कानून के मुताबिक समय पर दोषी के खिलाफ आरोपपत्र तैयार करने के लिए कार्रवाई की जा सके।

इसलिए जारी करनी पड़ी एडवाइजरी: 
  • एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी
  • मेडिकल जांच वक्त पर न होना
  • जान-बूझकर केस कमजोर बनाना
  • मामले को टालने की शिकायतें 
  • जरूरी फोरेंसिक प्रक्रिया का पालन न करना 

 
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