जसवंत सिंह: अटल के विश्वसनीय, ईमानदार नेता.. उदारवादी छवि से कभी नहीं किया समझौता

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 28 Sep 2020 02:22 AM IST
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पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह (फाइल फोटो)
पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

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सार

  • जसवंत सिंह: 3 जनवरी, 1938- 27 सितंबर, 2020
  • ईमानदार नेता ने कभी नहीं किया उदारवादी छवि से समझौता

विस्तार

सैन्य अधिकारी से राजनेता बने जसवंत सिंह को अटल बिहारी वाजपेयी के सबसे विश्वसनीय सहयोगियों में से एक थे। वाजपेयी के ‘हनुमान’ कहे जाने वाले जसवंत ने कभी भी अपनी उदारवादी छवि से समझौता नहीं किया। अटल सरकार में वित्त, विदेश और रक्षा जैसे अहम मंत्रालय संभालने वाले जसवंत ने 1999 में कंधार विमान हाईजैक मामले में अहम भूमिका निभाई, लेकिन यात्रियों को छुड़ाने की एवज में तीन खूंखार आतंकियों को सरकारी विमान से ले जाने पर उनकी छवि को धक्का भी लगा। उस समय वह विदेश मंत्री थे। 
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इंडियन एयरलाइंस के विमान (आईसी 814) में सवार 180 से अधिक यात्रियों को छुड़ाने के बदले भारत को तीन आतंकियों को छोड़ना पड़ा, जिनमें मौलाना मसूद अजहर, मुश्ताक अहमद जरगर और उमर सईद शेख शामिल थे। इस फैसले को लेकर अक्सर जसवंत सिंह की आलोचना होती थी।
विमान हाईजैक की यह घटना एनडीए सरकार की सबसे बड़ी नाकामियों में शुमार किया जाती है। अटल सरकार में जसवंत काफी ऊंचा ओहदा रखते थे। वाजपेयी के साथ उनका रिश्ता बेहद खास था, इस वजह से उन्हें हनुमान कहा जाता था। वाजपेयी सरकार में जसवंत सिंह पोखरण परमाणु परीक्षण, कारगिल युद्ध, 2001 में आगरा शिखर सम्मेलन समेत कई ऐतिहासिक घटनाओं व उपलब्धियों के गवाह बनें।
इतना ही नहीं परमाणु परीक्षण के बाद जब अमेरिका ने भारत पर कड़े प्रतिबंध लगाए तो जसवंत सिंह ही थे, जिन्हें अमेरिका के साथ बातचीत करने को भेजा गया था। दरअसल भाजपा का शीर्ष नेतृत्व शुरू से ही उन्हें पसंद करता था। फर्राटे से अंग्रेजी बोलने के हुनर का हर कोई कायल था। पार्टी के कई नेता ऐसा नहीं कर पाते थे।

कम बोलने और गहरी समझ वाले सिंह उदारवादी मूल्यों के कट्टर समर्थक थे। जसवंत सिंह 2004 से 2009 में राज्यसभा में नेता विपक्ष भी रहे। हालांकि जसवंत सिंह को कभी जन नेता के तौर पर नहीं देखा गया। पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच भी वह बहुत लोकप्रिय नहीं रहे। माना जाता है कि उन्हें सत्ता में ऊंचा मुकाम उनकी गहरी समझ के कारण हासिल हुआ

सेना छोड़कर राजनीति में आए 
जसवंत सिंह 1957 से 1966 तक सेना में रहे। सेना से रिटायर होने के बाद वह जोधपुर के महाराज गज सिंह के सलाहकार बने। 1967 में भैरो सिंह शेखावत के कहने पर वह राजनीति में आए। 29 साल की उम्र में पहली बार उन्होंने जनसंघ की ओर से बीकानेर सीट लोकसभा चुनाव लड़ा और उन्हें सिर्फ 18,564 वोट मिले और वह चुनाव हार गए।

1980 में पहली बार उन्हें राज्यसभा सांसद चुना गया। 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें पश्चिम बंगाल की दार्जिलिंग सीट से उम्मीदवार बनाया और उन्होंने जीत दर्ज की। जसवंत सिंह 2012 में उपराष्ट्रपति पद के लिए एनडीए के उम्मीदवार थे, उन्हें यूपीए उम्मीदवार हामिद अंसारी से हार का सामना करना पड़ा।
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दो बार भाजपा से निष्कासित हुए 

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Memories: Jaswant Singh Died, He Brought Three Terrorists To Kandahar, Was Called Hanuman Of Atal Bihari Vajpayee
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