जीतकर भी हारे रामविलास पासवान, अधूरी रह गई ये इच्छा 

अमित शर्मा, नई दिल्ली Updated Sun, 23 Dec 2018 07:24 PM IST
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Ram Vilas Paswan
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रविवार को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, लोक जनशक्ति पार्टी प्रमुख रामविलास पासवान और जेडीयू नेता नीतीश कुमार ने साझा प्रेस कांफ्रेंस कर बिहार में सीट समझौते पर सहमति होने की घोषणा की। समझौते के मुताबिक बिहार की 40 सीटों में से भाजपा 17, जेडीयू 17 और लोजपा 6 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। इसके अलावा एनडीए रामविलास पासवान को राज्यसभा में भी भेजेगा। 
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महादलित जातियों के एक बड़े नेता पासवान इसे अपनी जीत के तौर पर दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि इन सीटों के पाने के बाद भी पासवान की एक विशेष इच्छा अधूरी रह गई है। इस कारण उनकी इस 'जीत' का रंग कुछ फीका पड़ गया है। 
यह था पासवान का प्लान
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर अमर उजाला को  बताया कि पासवान इस फैसले से बहुत खुश नहीं हैं। इसका कारण यह है कि रामविलास पासवान लोकजनशक्ति पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिलाना चाहते हैं। इसके लिए वह पार्टी का अन्य राज्यों में विस्तार करना चाहते हैं। उत्तरप्रदेश उनकी इस इच्छा के लिए सबसे उर्वर जमीन हो सकता था जहां उनकी जाति के लोगों की अच्छी संख्या निवास करती है। 

जानकारी के मुताबिक रामविलास पासवान ने भाजपा अध्यक्ष के सामने बिहार में सीटों को कम करने की सूरत में पूर्वी उत्तरप्रदेश की एक या दो सीटों की मांग रखी थी। लेकिन भाजपा ने उनकी इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया। बताया जाता है कि पासवान के इस इरादे के पीछे युवा तुर्क चिराग हैं जिन्हें लोजपा प्रमुख ने अहम जिम्मेदारी दे रखी है। 

एलजेपी का तर्क 

दरअसल उत्तर प्रदेश की जनसंख्या का गणित उन्हें यहां अपना विस्तार करने के ख्वाब को पंख दे रहा है। साल 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में 21.1 फीसदी अनुसूचित जातियां रहती हैं। इनमें नौ फीसदी जाटव समुदाय अकेले सबसे ज्यादा हिस्सेदारी रखता है। इसके बाद 11 फीसदी का गैर-जाटव समुदाय आता है जिसमें पासी, मल्लाह और वाल्मीकी समुदाय आते हैं। रामविलास पासवान की नजर इसी वोटबैंक पर है। इसी वोटबैंक की कीमत पर वे भाजपा से एक-दो सीट हथियाने का ख्वाब देख रहे थे। 

एलजेपी नेता ने बताया कि दरअसल, उत्तरप्रदेश की अस्सी में से लगभग 40 सीटों पर पासी समुदाय काफी अच्छी संख्या में रहते हैं। कई सीटों पर इनकी आबादी चार से पांच फीसदी के लगभग है। जिस दौर में एक-दो फीसदी वोटों के अंतर से हार-जीत तय होती है, वहां यह वोटबैंक बड़ा अंतर पैदा कर सकता है। 

खासकर इसलिए भी क्योंकि यह वह वोटबैंक है जो किसी बड़े जातीय नेता की अनुपस्थिति में इस समय सबसे ज्यादा मायावती को वोट करता है। लेकिन कथित रूप से इस समुदाय को बसपा में भागीदारी नहीं मिली हुई है। पासवान इसी स्थिति का लाभ उठाना चाहते हैं।  

भाजपा ने इसलिए नकारा

एलजेपी नेता के मुताबिक साल 2014 का चुनाव परिणाम और मायावती का इस वोटबैंक पर दबदबा देख भाजपा ने पासवान की इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया। भाजपा का मानना है कि फिलहाल इस वोटबैंक पर पासवान की पकड़ नहीं है और वे उत्तरप्रदेश में अपनी जाति का वोटबैंक किसी अन्य पार्टी को ट्रांसफर कराने की स्थिति में भी नहीं हैं, इसलिये इस बेहद महत्त्वपूर्ण चुनाव में उनकी मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। 
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