कांग्रेस के आत्ममंथन में चल रही हैं ये तीन बातें, संसद में मोदी को घेरने के लिए बन रही खास रणनीति...

जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 05 Jun 2019 06:13 PM IST
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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी - फोटो : PTI

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कांग्रेस पार्टी में इन दिनों आत्ममंथन का दौर चल रहा है।इसमें मुख्य फोकस तीन बातों पर है।पहला, कांग्रेस पार्टी के घोषणापत्र में जमीनी सर्वे किए बिना ऐसी कौन सी बातें शामिल की गई, जिसका खामियाजा पार्टी को लोकसभा चुनाव में उठाना पड़ा। दूसरा, भाजपा के राष्ट्रवाद को टक्कर देने के लिए क्या रणनीति हो, इसके लिए कांग्रेस में भी एक मार्गदर्शक मंडल बने।तीसरा, संसद में मोदी सरकार को घेरने के लिए सभी विपक्षी दलों को एक साथ लेने की तैयारी।
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लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन से राहुल गांधी ही नहीं, बल्कि निचले स्तर तक के सभी पदाधिकारी और कार्यकर्ता भी परेशान हैं। पार्टी के भीतर ही कई तरह के आरोप-प्रत्यारोपों का दौर चल रहा है। एक तरफ राहुल गांधी की युवा टीम है जो हार के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं पर भांडा फोड़ रही है तो दूसरी ओर वरिष्ठ नेता हैं, जिन्हें यह शिकायत है कि राहुल की युवा टीम ने हमारी नही सुनी।नतीजा, सामने है।कई जगहों से कांग्रेस अध्यक्ष को बाकायदा ऐसी लिखित शिकायतें आई हैं, जिसमें कहा गया है कि कांग्रेसी नेताओं ने अपने ही प्रत्याशी को हराने का काम किया है।राहुल गांधी के नेतृत्व में एक टीम हर राज्य में पार्टी की स्थिति पर चिंतन कर रही है।लोकसभा चुनाव में पार्टी का सर्वे क्या कह रहा था और नतीजे कैसे मिले, इन सब बातों का बहुत गहराई से विश्लेषण चल रहा है।
पहली बात: 
कांग्रेस के घोषणा पत्र में ऐसी कौन सी बातें रही, जिससे पार्टी को फायदा पहुंचने की बजाए नुकसान हुआ है। जैसे, जम्मू-कश्मीर के बारे में कांग्रेस ने कहा, वहां सेना की तैनाती और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती कम करेंगे, सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम की समीक्षा होगी। बता दें कि उसी वक्त भाजपा नेता पुलवामा हमला और बालाकोट एयर स्ट्राइक जैसे मुद्दों को फ्रंट फुट पर रख कर खेल रहे थे। ऐसे मौके पर कांग्रेस के किस नेता ने भाजपा के राष्ट्रवाद को दरकिनार कर घोषणा पत्र में उक्त बातें डलवा दी। 72 हजार रुपये देने वाली न्याय योजना के बारे में कहा गया कि उत्तर भारत के अनेक राज्यों में यह योजना भाजपा के राष्ट्रवाद को टक्कर देगी। जब चुनावी नतीजे आए तो सब कुछ इसके उल्ट हुआ। पी चिदंबरम, आनंद शर्मा, राजीव गौडा, कुमारी शैलजा और सैम पित्रोदा जैसे कई नेताओं से इस बाबत जवाब तलब किया जा रहा है।

दूसरी बात: 
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी सहित कई विपक्षी दलों ने अलग अलग चुनाव लड़ा था। अब सभी पार्टियां महसूस कर रही हैं कि अगर संसद में भी वे अपने अलग एजेंडे पर चले तो मोदी सरकार को घेरना मुश्किल होगा। इसके लिए कांग्रेस पार्टी की ओर से कई विपक्षी दलों से बातचीत की जा रही है। इसमें ममता बैनर्जी, मायावती, अखिलेश यादव और शरद पवार आदि नेता शामिल हैं। एनसीपी और कांग्रेस पार्टी के विलय की भी चर्चा है। हालांकि एनसीपी अभी इससे इन्कार कर रही है। कांग्रेस पार्टी के एक नेता का कहना है कि राहुल गांधी ही पार्टी अध्यक्ष रहेंगे। वे संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को घेरने के लिए पूरे विपक्ष की सांझा रणनीति तैयार कर रहे हैं। इसकी बानगी संसद के पहले सत्र में देखने को मिल सकती है।

तीसरी बात: 
लोकसभा चुनाव में राष्ट्रवाद के मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी कहीं भी भाजपा के सामने नहीं टिक पाई। हिंदी भाषी प्रदेश, जैसे राजस्थान, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, हरियाणा और मध्यप्रदेश में भाजपा का राष्ट्रवाद वोटरों के सिर चढ़कर बोला। इन राज्यों में कांग्रेस बुरी तरह हारी है। कांग्रेस ने केवल उन निर्वाचन क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन किया, जहां गैर-हिंदू मतदाताओं की संख्या ज्यादा रही। हिंदूत्ववादी ताकतों को समझने में कांग्रेस पार्टी पूरी तरह फेल रही। कांग्रेस पार्टी को अब इस भूल का अहसास हुआ है। पार्टी अब अपनी मौजूदा नीति से बाहर निकलने का प्रयास कर रही है। इसके लिए भाजपा के मार्गदर्शक मंडल या आरएसएस के चिंतकों की तरह कांग्रेस पार्टी भी एक मार्गदर्शक मंडल बनाने जा रही है। इसमें कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को शामिल किया जाएगा।
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