दिल्ली का रामलीला मैदान और जंतर-मंतर छोड़कर रालेगण सिद्धि में अनशन पर क्यों बैठे हैं अन्ना हजारे

जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली  Updated Wed, 30 Jan 2019 07:35 PM IST
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anna hazare - फोटो : अमर उजाला

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सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे एक बार फिर अपनी मांगों को लेकर अनशन पर बैठ गए हैं। इस बार अनशन स्थल बदल गया है। वो दिल्ली का रामलीला मैदान या जंतर-मंतर नहीं है। अन्ना ने अनशन के लिए अपने गांव रालेगण सिद्धि को चुना है। सवाल उठना लाजमी है कि क्या हजारे का जादू खत्म हो गया है। 
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क्या कुछ तथाकथित लोगों ने उन्हें गांधी बनाने का जबरन प्रयास किया था। क्या इन्हीं लोगों की वजह से 2011 का वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन 'अन्ना आंदोलन' बना दिया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो उस वक्त गुजरात के सीएम थे, कहा करते थे कि ये अन्ना हजारे लोकपाल के लिए अपनी जान देने को तैयार है। अन्ना का आरोप है कि आज वही मोदी उनके पत्रों का जवाब देना तक उचित नहीं समझते।
बुधवार को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के दिन अन्ना हजारे सुबह 10 बजे अपने गांव रालेगण सिद्धि में अनशन पर बैठ गए हैं। भीड़ कम है और मीडिया की नजर भी पल दो पल के लिए ही वहां तक पहुंच पा रही है। इन सब बातों से परे अन्ना हजारे पहले की तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने के प्रयासों में लगे हैं। जिस 'लोकपाल' के लिए उन्होंने 2011 में बड़ा आंदोलन कर तत्कालीन यूपीए सरकार को हिलाकर रख दिया था, वह अभी तक अस्तित्व में नहीं आया है। 
अन्ना कहते हैं कि उस वक्त लोकायुक्त की नियुक्ति हो जाती तो राफेल जैसे मुद्दे देखने को नहीं मिलते। भ्रष्टाचार पर काफी हद तक अंकुश लग चुका होता। उनके बहुत ही करीबी रहे एक शख्स जो अब नियमित तौर पर उनके साथ नहीं हैं, का कहना है कि अन्ना जी का अपना कोई विचार न होना, इसी बात ने जनता के साथ उनकी दूरी बढ़ा दी है। 

अतीत में जाकर देख लें कि 2011 में जब वे शीर्ष पर थे तो भी लोगों ने मार्केटिंग के जरिए उन्हें जबरन गांधी बनाने का प्रयास किया था। उनकी हर बात को एक मुखौटे के तौर पर लिया गया। कुछ लोगों ने अपने फायदे के मद्देनज़र भ्रष्टाचार विरोध आंदोलन को अन्ना आंदोलन का नाम दे दिया। 

चाहे किसी भी मकसद से, मगर आंदोलन को आगे बढ़ाने वाले अरविंद केजरीवाल, किरन बेदी, मनीष सिसोदिया और कुमार विश्वास आदि सभी लोगों ने अपनी सुविधानुसार नई राह पकड़ ली। योगेंद्र यादव ने भी राजनीतिक पार्टी बनाई, लेकिन वे किसानों और छात्रों के मुद्दे उठाकर आज भी खुद को आंदोलनकारी बनाए हुए हैं।
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...और जनता का समर्थन कम होता चला गया 

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