आ अब लौट चले ..............

अमर उजाला नेटवर्क Updated Thu, 04 Jun 2020 01:13 AM IST
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डॉ. मंजू सिंह
डॉ. मंजू सिंह - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

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सार

किसी बुजुर्ग ने एक बार मुझसे कहा था, ‘‘नोैकरी मत करियो, धास खोद खाइयो। कोई खोदे दूर, तु पास ही खोदियो। । ‘‘
उस समय मुझे इसका मतलब समझ नही आया था, पर आज दिल की गहराई को छु चुका है कि उनके ‘पास‘ का क्या मतलब था। पलायन आधुनिक समाज का एक यर्थाथ सत्य है । यह प्रायः ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्र की ओर होता है । इसे जीविका के लिये एक अवसर के रूप में देखा जाता है। जहां पलायनकर्ता की अपने समाज में प्रतिष्ठा बढती है, वहीं शहरी समाज में उसे उक परजीवी के रूप में देखा जाता है।- डॉ. मंजू सिंह

विस्तार

भारतीय (प्रवासी) मजदूर का ‘‘वापसी पलायन’’

ग्रामीण परिवेश से आये व्यक्तियों को अक्सर अकुशल मजदूरी वाले कार्य, जो प्रायः असंगठित क्षेत्र में उपलब्ध है, ही करने को मिलते है। इन कार्याे का स्वभाव अक्सर नियमित नहीं होता और इनकी मजदूरी भी कम होती है। इन परिस्थतियों में उन्हें अपना जीवन गुणवत्ता के आधार पर सबसे नीचे वाले पायदान से शुरू करना पड़ता है। ये हाशिये पर रहने वाले लोग अक्सर समूह में रहते है। जिसमे प्रायः या तो इनके गांव के लोग या रिश्तेदार होते है। कच्ची बस्तियों के एक-एक कमरे में कई- कई लोग रहते है। जहां पीने के पानी, स्वच्छता, बिजली, सफाई आदि जैसे मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव होता है। हां, यहां अपराध और असुरक्षा का माहौल अवश्य प्रचुर मात्रा में मिलता है। ऐसे माहौल में मजदूर अक्सर अपने परिवार के साथ रहने को मजबूर होते है। जरा परिकल्पना करके सोचिये कि इस गरीब, मजबूर, ग्रामीण  को महानगर में आकर किस-किस प्रकार के हादसों का सामान करना पड़ता होगा और इस प्रकार के सांस्कृतिक अंतराल से उन्हें किस प्रकार का सांस्कृतिक धक्का लगता होगा। इन सब विपरीत परिस्थितियों के बावजूद ये लोग शहरों में बसने को मजबूर हो जाते है। जिनका शरीर तो शहर में, परंतु आत्मा उनके गांव मे ही बस्ती है और इस प्रकार ये लोग अपने परिवार व रिश्तेदार जनों को आर्थिक सहयोग देने में कामयाब हो पाते है। इन भारतीय मजदूरों को प्रवासी बताकर इन्हें शहरीें सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और वातावरण पर कुप्रभाव के रूप में देखा जाता है। अक्सर इन भारतीय (प्रवासी) मजदूरों को किसी ना किसी रूप में, कभी किसी राज्य से, कभी किसी राजनीतिक दल से, विरोध का सामान करना पड़ता है। इतनी विपरीत परिस्थितियों और विरोध के पश्चात् भी इन्होंने कभी शहरी छोड़कर गांव की और रूख करने के प्रयास नहीं किये, ‘‘जीना यहां मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां ...........’’।

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कोरोना (इस सदी की महामारी) काल में ऐसा क्या हुआ, जो आजतक नहीं हुआ था। शायद भारत के 1947 के बंटवारे के बाद पहली बार इतनी बड़ी जनसंख्या का विस्थापन हुआ। इस विस्थापन को  ‘‘रिवर्स माईग्रेसन’’ अथवा ‘‘वापिसी पलायन’’ इस सदी की एक नई  प्रक्रिया के रूप में उभर कर आई है। जिसमें प्रवासी मजदूर ने वापिस अपने गांव का रूख कर लिया। ‘‘आ अब लौट चले..............’’ की प्रक्रिया में ऐसा क्या अनोखा पाने वाले है मजदूर? पाने से पहले, कितना खोने का खतरा, कितनी परेशानियां, यह सब तो हम रोज समाचारों तथा सोशल मिडिया के माध्यम से देख और समझ रहे है। स्थितियां इतनी भयावह है कि खुद को इंसान कहने में शर्म आ रही है। अपने देश पर अभिमान करने वाले सिर झुके जा रहे है- जाने मरने वालो की संख्या कहां तक पहुंच गई, जाने कितनी माँ अपने मृत बच्चे को उठाये जा रही है, जाने कितने भूखे-प्यासे लोग सड़को पर चल-चल कर थक गये है। यही है समन्वित विकास की परिकल्पना- कहां है सड़को किनारे छायादार वृक्ष, प्याऊ और विश्राम स्थल ? क्या हमने कभी सोचा था ऐसा मंजर, जो शायद सोचने पर ही कंपा देता, हमने तो देख भी लिया और ऐसे मे सरकार से अपेक्षा बनी निराशा, ‘‘मै ये सोच कर उसके दर से उठा था, के वो रोक लेगी, मना लेगी मुझको ...........’’।

आखिर, इसके मुख्य कारण क्या हो सकते है:-

(क)    रोजगार की अनिश्चितता :-  कोरोना की बीमारी से बचाव के जो भी माध्यम बताये गये, उसके पश्चात् एक अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई है। पता नहीं कौन सा रोजगार चलेगाघ्, कौन सा नहीं ?, कैसे चलेगा ?, कब शुरू होगा ?, किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा है। अब जिस मूलभूत कारण से भारतीय (प्रवासी) मजदूर यहां रह रहे थे वहीं समाप्त होता नजर आ रहा है तो यहां रहना व्यर्थ हो गया है। शहरों का जीवन, बगैर पैसे या खर्चे के सम्भव नही है। यहां रहने का, खाने का और अब तो छींकने-खांसने का भी खर्च देना है। इन परिस्थितियों में बगैर रोजगार जीवित रहना सम्भव सा नजर नहीं आता। शहरी माहौल तो ‘‘पैसा फेंको, तमाशा देखो............’’ को ही चरितार्थ होता है। 
(ख)    सुरक्षा:- भारत देश की इतनी बढ़ी जनसंख्या ऐसा असुरक्षित जीवन जी रही है। यह शायद हम सबकी परिकल्पना से भी परे था। भारतीय (प्रवासी) मजदूर जो हमारे सामाजिक और आर्थिक विकास में एक नींव के पत्थर की भांति काम करते है, क्या इतनी असुरक्षा दी है हमने बदले में उन्हें ? यहां सरकार (मेरा अभिप्रायः किसी प्रकार की दलगत राजनीति अथवा पूर्व या वर्तमान राजनीति से नहीं) की अगर दूरदृष्टि होती और जो फर्ज भी था कि इन प्रवासी मजदूरों को किसी प्रकार के बीमा अथवा अन्य आर्थिक आजादी की सुरक्षा मिली होती तो शायद आज परिस्थितियां बेहतर होती। शहरों में रिश्ते सिर्फ काम से होते है। उन रिश्तों मे अपनेपन की गहराई नही होती है। इसलिये ही शायद आज मजदूर वापिस लौट चला है, ‘‘यहां कौन है तेरा, मुसाफिर रूकेगा कहां............’’।

(ग)        डर:- आज भारतीय मजदूर इतना डर चुका है कि उसका भावनात्मक तर्क, आर्थिक तर्क पर भारी पड़ चुका है। आज उसके मन में एक ही सोच है कि जीना है तो अपनों के बीच और मरना है तो अपनों के बीच। बस और कुछ भी नहीं,  ‘‘ओ मेरे माझी, ओ मेरे माझी, मेरे साजन है उस पार, मै मन मार, तू उस पार, ओ मेरे माझी, अबकी बार ले चल पार, ...........’’।

(घ)        समूह में शक्ति , विश्वास और सुरक्षा:-  यहां ध्यान देने वाली एक बात और है कि यदि कोई मजदूर रूकना भी चाहे जाक रूक ना सकेगा। मजदूर का जीवन इतनी अनिश्चितताओं से भरा होता है कि वह उसे अकेले निर्णय लेने की क्षमता प्रदान नहीं करता और उसे समूह में रहने को मजबूर करता है। यदि किसी मजदूर को 10 दिन तक काम ना मिले और उसके पास खाने को ना बचे तो उसके गांव वाले अथवा रिश्तेदार जिनके साथ वह रह रहा होता है उसे मदद कर देते है। यही होता है उनका बैंक खाता, आज लिया, कल दिया । यह उनकी रोजमर्रा की जिन्दगी का हिस्सा है। इसलिये यदि उसके समूह के लोग-  उसके सुखः- दुखः के साथी, गांव की ओर निकलेंगे तो वह अकेला पीछे रूकने में नाकामयाब होगा,  ‘‘साथी हाथ बढ़ाना, साथी रे, साथी हाथ बढ़ाना, साथी रे, एक अकेला थक जायेगा, मिलकर बोझ उठाना ...........’’।

(च)     सरकारी आश्वासन बेअसर:-यहां जिस जिन्दगी और मौत की कशमकश चल रही है, जिसमें यह मालूम ही नहीं कि जहां है वहां रूकने से जिन्दगी बचेगी या  जहां से आये थे वहां पहुॅचने   से जिन्दगी बचेगी। इन सब परेशानियों के बीच, अगर कहीं से इंसान को इस सभ्य समाज में उम्मीद होती है तो वह हैै,  राजनीतिक तंत्र से कि वह समस्या को समझ कर अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए कार्यवाही करे। इस विपति काल में, सिर्फ खोखले आश्वासन-  चाहे पक्ष हो या विपक्ष के, सभी एक ही थाली के चट्टे बट्टे नजर आते है - सब बेअसर नजर आते है। समस्या समाधान प्रबंध में सब विचलित है। लोगों की छोटी-छोटी बातें समझ में नही आती है क्योंकि अब वोट मांगने के लिये भी सोशल मिडिया का इस्तेमाल किया जाता है, नेताओं का लोगों से संपर्क ही कहां बचा है। सिर्फ चमचे ही तो उनसे मिलने का रास्ता निकाल लेते है। लेकिन कोरोना काल ने यह तो साबित कर ही दिया कि ना तो कुछ राजनीतिक तंत्र सकारात्मक कर सकता है और ना ही जनता उनसे उम्मीद करती है। जनता का विश्वास अपने नेताओं से उठ चुका है, जिन्हें उन्होनें पूरे देश की बाागडोर सौंप रखी है, ‘‘ये पब्लिक है, ये सब जानती है, ये पब्लिक है, अन्दर क्या है, बाहर क्या है, ये सब जानती है, बस बोलती नही है, ...........’’।

इस ‘‘वापसी पलायन’’ से आखिर क्या मिलेगा, इन मजदूरों को? यह तो निश्चित है कि गांव में आर्थिक स्वावलम्बन होता, कृषि एक लाभकारी रोजगार होता, क्षेत्र में कुछ कार्य ऐसे होते है जिन्हें करके मजूदर अपना पेट भर सकते तो शायद इन्हें पलायन करने की आवश्यकता ही नही पड़ती है। पलायन करना हमारे समाज में असमान विकास का परिणाम है। अभी तो जमीन जैसे सीमित संसाधन पर ही दबाव बढ़ेगा, रोजगार नहीं मिलेगा, और मजबूरियां बढ़ेगी। पर मजूदर शायद जिन्दा रहने में कामयाब हो सकंेगे। उन्हें पता है कि वो कितने भी गरीब होंगे। कुछ अन्न पेट भरने को मिल ही जायेगा। कोई गाय, भैंस, बकरी एक-दो लीटर दूध उनके बच्चों के लिये दे ही देगी। यानि एक आश कि गांव की अर्थव्यवस्था कितनी भी कमजोर हो पर जीवन दायिनी तो है ही। शहरों के जैसे खोखली तो नहीं।  वैसे तो जीवन को कायम रखने के लिये परिस्थितियों को समझौते की आदत मजदूरों का होती ही है, ‘‘समझौता गमों से कर लो, समझौता गमों से कर लो, जीवन में गम भी/ही मिलते है, ओ ओ ओ समझौता गमों से कर लो, ...........’’।
इस ‘‘वापसी पलायन’’ में जो सकारात्मक उम्मीद की किरण दिखाई दी है। वह है:-
(अ)     जिन मजदूरों को हम आज तक दीन-हीन, मजबूर, लाचार, बेचारे, परजीवी, आदि के विशेषण से संबोधित करते आये है तथा सदा उनके शोषण ही सोचते रहे, उनके ‘‘वापसी पलायन’’ ने यह तो साबित कर दिया है कि शहरी जीवन के संचालन मंे उनका कितना बड़ा योगदान था? वो एक अदृश्य शक्ति के पूंज के रूप मंे हमें आगे बढ़ने में सहयोग कर रहे थे और हमने उन्हें दूध से मक्खी के जैसे निकाल कर फेंक दिया, उन्हें रोक ना सके, अपना ना सके,  ‘‘तेरी दुनिया से हो के  मजबूर मै चला मै बहुत दूर, बहुत दूर चला, ...........’’।

(ब)    आज सभी  आॅफिस और कारखाने बंद पड़े है तो हमें समझ में आ रहा है कि मजदूर हमारे आर्थिक विकास की रीढ़ की हड्डी था, है, और हां, सदा रहेगा। विकास की ओर अग्रसर होने का अभिप्राय यही है शायद- किसी का शोषण करके आगे बढ़ना, नहीं तो समाजवाद ही आ जायेगा। अब हमें समझ में आ रहा है कि हकीकत में मजबूर और लाचार कौन है मजदूर या उद्योगपति; मजदूर या शहरी; मजदूर या व्यापारी; परन्तु नुकसान आज भी मजदूर का ही है और कल भी मजदूर का ही होगा क्योंकि ये उद्योगपति और व्यापारी (चालाक लोमड़ियॅा), फिर भी कोई रास्ता निकाल लेंगे और शोषण करने का, ‘‘कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया, बात निकली तो हर बात पे रोना आया, ...........’’।

(स)     जो राजनेता उन्हें अपने क्षेत्रों से भगाने की राजनीति करते थे आज इन अथवा उद्योगपतियों, व्यापारीयों और शहरी लोगों के इशारे पर मजदूरों को रोकने का प्रयास कर रहै है, प्रलोभन दे रहे है आज उन्हें अच्छी तरह से समझ में आ गया है कि मजदूरों के बिना उनकी जिन्दगी का चक्काजाम हो चुका है, ‘‘पैसा ये पैसा, पैसा है कैसा, नही कोई ऐसा, ...........’’।

इस ‘‘वापसी पलायन’’ ने कुछ पत्ते और भी खोल दिये है। वह है:-

(य)     कभी-कभी अफसोस राजनीति को उस वर्ग पर भी होता है, जो सदा अपने मजदूरों का शुभचिंतक दिखाने में कामयाब हुआ था- जो सिर्फ झण्डा लेकर मुद्दों पर खड़ा हुआ, जो सिर्फ घटनाओं पर केन्दित रहा और उनकी गहराई में छुपी एक भी राजनीति पर संघर्ष ना कर सका। काशः कोई ऐसी बीमा व्यवस्था भी बन जाती जो आज की परिस्थितियो में मजदूरों को कोई सुरक्षा दे पाती। यदि उन्होंने आर्थिक आजादी, आर्थिक पारदर्शिता, और आर्थिक अतिव्ययता जैसे मुद्दों पर काम किया होता तो हमारी अर्थव्यवस्था इतनी ना चरमराती और आज मजदूरोें को उसका लाभ मिलता। मध्यम वर्ग भी शायद मदद के हाथ और ज्यादा बढ़ा पाता। जब देश में बड़े-बड़े घोटाले होते रहे,  जब बैंकों का अनर्जक ऋण वापस नहीं आये, जब चुपचाप ही उद्योगपतियों के करोड़ों रूपये माफ किये गये, करोडो रूपये प्रोत्साहन के रूप में उद्योगपतियों को बांटे गये, उन्हें तरह-तरह से फायदा पहुंचाया गया और किसानो के तीन- तीन साल तक भुगतान ना कर उन्हें भी मजूदर बनाया गया। उस समय यह अपने को पढ़ा लिखा और प्रगतिशील राजनीति करने वाले लोगों का समूह कहाॅ था ? यह सब भी शायद अपने स्वार्थ ही सिद्ध कर होगेे और गा रहे थे, ‘‘हम मेहनतकशः जब अपना हिस्सा मागेगे, ...........’’।

(र)     1947 में भारत देश विभाजन के बाद, शायद पहली बार इतनी भारी संख्या में भीड़ सड़को पर उतरी और इतने कष्ट उठाकर, कुछ अपने घर पहुंच गये तो कुछ ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। यह इतिहास शायद पहली बार ही रचा गया होगा कि माहमारी आने से इतनी भारी संख्या में ‘‘वापसी पलायन’’ हुआ। इस मौके पर हमारे नेतागण हमें सीख दे रहे है कि हर समस्या को अवसर में बदल दोे, विचार तो बहुत अच्छा है पर क्या आज के परिपेक्ष में उस मजदूर पर सटीक बैठता है जो इस कशमकश में ही पहले जान बचायें या अवसर पर नजर रखें। हा,ॅ बड़े उद्योगपतियों ने इसकी पालना पूर्ण रूपेण की। हमारे नीति निर्धारकों ने भी इस अवसर का लाभ उठाते हुये मजदूरी के घण्टे 8 से बढ़ाकर 12 कर दिये। एक मजदूर, जो सदा आभाव की जिन्दगी जीता है और उसे किसी प्रकार की सुविधायें परोसी नहीें जाती, अगर वह 8 घंटे काम करता है तो उसकी तैयारी और आने-जाने में उसके 12 घंटे ही खत्म होते है। अब अगर 12 घंटे काम करेगा तो उसके 16 घंटे खर्च होंगे। क्या यह मानवीय है या व्यावहारिक है ? किसी भी व्यक्ति से उसके जीवन के हर रोज 16 घण्टे छीन लेना, जिसको देने के लिये आपके पास कुछ भी नहीं, ‘‘या दिल की सुनो दुनिया वालो या मुझको अभी चुप रहने दो, मै गम को खुशी कैसे कह दूॅ जो कहते है उनकोे कहने दो ...........’’।

(ल)    अब खबरे आने लगी कि श्रमिकों के ठेकेदार लक्जरी बस लेकर उन्हें वापिस लेने पहुंच गये। क्या कहें इसे? मजदूर की जीत, मालिक की मजबूरी, शोषण तंत्र की सक्रियता और इन सब के बीच गरीबी- बेचार, लाचार और परेशान पर फिर राजनीति प्रारम्भ। इन सब घटनाओं को देखते हुये सभी- सरकार, विद्वान, नीति- निर्धारको सिर्फ और सिर्फ मूक बधिर दृष्टा की तरह देखते रहे, सब समझ के आरपार, और शायद यही थी सबसे मजबूरी, ‘‘जिन्दगी का सफर है ये कैसा सफर कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं,...........’’।
 
 

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