बदलाव का एक सालः हर भारतीय के लिए खुले जम्मू-कश्मीर के द्वार, भ्रष्टाचार पर कस रही नकेल

बृजेश कुमार सिंह, जम्मू Updated Sat, 31 Oct 2020 04:58 AM IST
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Bahu-Mahamaya ropeway - फोटो : अमर उजाला

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सार

  • केंद्र शासित प्रदेश बनने के एक साल में कई मायनों में बदल गया जम्मू- कश्मीर, राज्य के 86 कानून समाप्त
  • सामरिक ही प्रशासनिक मोर्चा भी हुआ मजबूत, सामाजिक और राजनीतिक संतुलन भी साधने की कोशिश
  • प्रदेश में त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू, पहली बार जिला विकास परिषद के गठन का रास्ता साफ

विस्तार

राज्य पुनर्गठन कानून लागू होने के एक साल के भीतर जम्मू-कश्मीर में विभिन्न स्तरों पर कई बदलाव हुए हैं। केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद सामरिक ही नहीं प्रशासनिक मोर्चे को मजबूती मिली है। प्रदेश में विकास की रफ्तार तेज होने के साथ भ्रष्टाचार पर भी नकेल कस दी गई है। निजाम बदलने के साथ एक साल के दौरान जम्मू-कश्मीर में 86 कानून खत्म हो गए हैं। केंद्र के कानून लागू हुए हैं। प्रदेश में पंद्रह साल रहने वालों को जम्मू-कश्मीर के स्थायी नागरिक बनने का हक देने और भूमि स्वामित्व कानून में बदलाव कर पूरे देश के लोगों के लिए जम्मू-कश्मीर के द्वार खोल दिए गए हैं। सामाजिक और आर्थिक ही नहीं परिसीमन की प्रक्रिया शुरू कर राजनीतिक स्तर पर भी संतुलन साधने की कोशिश धरातल पर दिख रही है। 
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इसी बीच, त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू करने के लिए नियमों में संशोधन कर जम्मू-कश्मीर में पहली बार जिला विकास परिषद के गठन का रास्ता साफ कर दिया गया है।
कोरोना संकट के बीच इस अरसे के दौरान प्रदेश में कई बड़े प्रोजेक्ट शुरू हुए हैं। एलजी के सीधे नियंत्रण में एसीबी के आ जाने से भ्रष्टाचार के मामलों पर कार्रवाई हो रही है। सीबीआई ने भी अब सीधे भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई करना शुरू कर दिया। कई बड़े अधिकारियों पर केस दर्ज हो चुके हैं। नए भूमि कानून से नए उद्योगों का रास्ता भी साफ हो गया है। 
इससे रोजगार के नए द्वार खुलेंगे। लोगों से संवाद बनाने के लिए बैक टू विलेज की तर्ज पर सरकार ने शहरी इलाकों के लोगों के लिए मेरा शहर, मेरी शान नाम कार्यक्रम शुरू किया है। पूरे राज्य में सड़क, बिजली, पानी, सुरंग के निर्माण की दिशा में कोरोना संकट के बावजूद काम सुचारू किया गया। पीएमजीएसवाई में राज्य का पूरे देश में दूसरा स्थान रहा। कश्मीर को लद्दाख से जोड़ने वाली सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जेड मोड और जोजिला टनल का काम शुरू हो गया है। जम्मू में एम्स शुरू किया जा रहा है। इसी सत्र से पहला बैच बिठाने की तैयारी है। केंद्रीय कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग का लाभ मिला। एसआरओ 202 को समाप्त किया गया, जिसमें कर्मचारी के प्रोबेशन की अवधि पांच साल रखी गई थी। इसे हटाकर देश के अन्य राज्यों की तरह प्रोबेशन अवधि दो साल की गई। 

अलगाववादियों की भी अब नहीं सुन रहे घाटी के लोग
घाटी में अलगाववाद तथा आतंकवाद की लगभग कमर टूट गई। पूरे एक साल में कभी भी अलगाववादियों ने बंद की कॉल नहीं दी। बीते 27 अक्तूबर को विलय दिवस पर इनके आह्वान को आम जनता ने किनारे कर दिया। अधिकांश दुकानें खुलीं रहीं। पत्थरबाजी बीते दिनों की बात हो गई। बीते एक साल में कभी कभार सुरक्षा बलों को आंसू गैस के गोले दागने पड़े, जबकि पूर्ववर्ती राज्य में आए दिन हिंसक प्रदर्शनों के दौरान आंसू गैस के गोले चलाने पड़ते थे।

एनआईए का भी शिकंजा भी और कसा
एनआईए ने भी अपना शिकंजा आतंकियों तथा उनके समर्थकों के खिलाफ और कसा। इसके साथ ही अलगाववादियों के समर्थकों पर भी पैनी निगाह रखी।

राजनीतिक गतिविधियां शुरू, सभी प्रमुख नेता रिहा
अनुच्छेद 370 हटने के बाद नेकां प्रमुख डॉ. फारूक अब्दुल्ला, उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला, पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती, पीपुल्स कांफ्रेंस प्रमुख सज्जाद गनी लोन समेत नेकां, पीडीपी तथा कांग्रेस के प्रमुख नेताओं को नजरबंद कर दिया गया था। इन सभी को धीरे धीरे रिहा किया गया। अब लगभग सभी प्रमुख नेता रिहा हो चुके हैं और घाटी में सालभर से बंद राजनीतिक गतिविधियां दोबारा शुरू हो गई हैं। यह अलग बात है कि पीपुल्स एलायंस फार गुपकार डिक्लरेशन (पीएजीडी) नामक नया गठबंधन खड़ा कर कश्मीर केंद्रित पार्टियों ने अनुच्छेद 370 की बहाली के लिए संघर्ष का संकल्प लिया है। अनुच्छेद 370 हटने के बाद उत्पन्न परिस्थितियों के मद्देनजर कश्मीर में नेकां और पीडीपी का विकल्प बनने के लिए जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी का गठन किया गया। 

उप राज्यपाल बदले, राजनीतिक खिलाड़ी मनोज सिन्हा को कमान
पिछले साल 31 अक्तूबर को राज्य के पुनर्गठन के साथ ही एलजी के तौर पर जीसी मुर्मू को राज्य की कमान सौंपी गई। लेकिन उप राज्यपाल प्रशासन आम जनता का विश्वास जीतने में सफल नहीं हो पाया। लोग प्रशासन के समक्ष अपनी फरियाद लेकर पहुंचने से कतराते रहे। आम जनता के प्रशासन से कटने के फीडबैक पर केंद्र सरकार ने राजनीतिक खिलाड़ी मनोज सिन्हा को नया दायित्व सौंपा है। अपने तीन महीने के कार्यकाल में उन्होंने जनता की विश्वास बहाली का प्रयास शुरू किया है। इसके लिए समाज के सभी वर्गों के साथ मेलमिलाप का कार्यक्रम बढ़ाया है ताकि प्रशासन की सीधे पहुंच बढ़ाई जा सके।

तिरंगा भी फहराने में अब हिचक नहीं
पुनर्गठन के बाद कश्मीर घाटी में भी लोगों ने सार्वजनिक रूप से तिरंगा फहराया। 15 अगस्त, 26 जनवरी के साथ ही विलय दिवस पर 26 अक्तूबर को घाटी के विभिन्न स्थानों पर तिरंगा फहराया गया। घाटी में तिरंगा रैली तक निकाली गई। इसमें भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ ही आम कश्मीरियों ने भी हिस्सेदारी की।
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