आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Book Review ›   Kuchh to log kahenge by Shivangi purohit based on Youth life college going days Book Review
Kuch to log kahenge by Shivangi

इस हफ्ते की किताब

कुछ तो लोग कहेंगे: नए दौर की कहानियों के जरिए युवा पाठकों के दिल में जगह बनाती किताब

258 Views
एक कहानीकार की सफलता इसी में होती है कि उसका लिखा पढ़ते हुए पाठक के मानसपटल पर दृश्य उभरने लगे। कहानी के पात्रों की कल्पना कर सके, उसका दृश्यरूपण कर सके। हर कहानी के लिए जरूरी नहीं कि वह अंत में किसी नतीजे पर ही पहुंचे। सुखांत और दुखांत के अलावे कुछ कहानियां ऐसी भी होती हैं, जो अधूरी होती हैं या फिर अंत में आपको कुछ सवालों के साथ अकेला छोड़ जाती हैं। एक पाठक को यह अकेलापन भी सुकून देता है। 

मध्यप्रदेश के होशंगाबाद के खापरखेड़ा की रहने वाली शिवांगी पुरोहित ने भले ही अपना स्नातक(ग्रेजुएशन) भी पूरा नहीं किया है, लेकिन एक लेखिका के तौर पर वह अपनी उम्र से काफी परिपक्व दिखती हैं। वह नए दौर की लेखिका हैं और उनकी नई किताब 'कुछ तो लोग कहेंगे' नए दौर के पाठकों को जोड़ने में सफल होती दिखती है। यह शिवांगी की पांचवी किताब है। इससे पहले उनकी किताब 'सांझी' ने भी पाठकों का ध्यान खींचा था। 

फिलहाल बात उनकी नई किताब की। 'कुछ तो लोग कहेंगे' किशोर और युवा जीवन पर केंद्रित पांच कहानियों का संग्रह है। इन कहानियों में किशोर से युवावस्था में की गई नादानियों, गलतियों से जीवन के अहम सबक सीखने तक का सफर दिखता है। इन कहानियों में कहीं-कहीं आपको निराशा होती है, कहीं कुछ गैरजरूरी खिंचाव दिखता है, लेकिन सबसे अच्छी बात है कि इन कहानियों में पाठक खुद को कहीं न कहीं जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। 

हम जिंदगी में कई महत्वपूर्ण फैसले लेने से पहले यही सोचते रहते हैं कि लोग क्या कहेंगे! इस संग्रह की शुरुआत 'क्या कहेंगे लोग' शीर्षक की कहानी से होती है। कहानी का पुरुष पात्र अपने जीवन का एक बड़ा फैसला इसी डर के कारण नहीं ले पाता है कि लोग क्या कहेंगे। कहानी में उसके वैवाहिक जीवन की अपरिपक्वता दिखती है। त्रिलोक और वैभवी की कम उम्र में हुई शादी एक दुखांत पर खत्म होती है, जहां पछतावे के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता। और तब महसूस होता है कि काश 'लोग क्या कहेंगे' के बारे में नहीं सोचा होता। कहानी पढ़ते हुए आपको ऐसा लगता है कि घटना जैसे पड़ोस की, मुहल्ले की, गांव-समाज की हो।  

इंजीनियर और डॉक्टर बनने का सपना लिए हर साल न जाने कितने हजारों-लाखों किशोर राजस्थान के शहर कोटा का रुख करते हैं। उनमें से कइयों के सपने पूरे होते हैं तो वहीं अनगिनत किशोर निराशा के साथ लौटते हैं। सपनें, उम्मीदें, संघर्ष और दर्द को समेटे चार किशोरों की कहानी है-कोटा लाइन्स। 

इस किताब की तीसरी कहानी 'रॉन्ग नंबर' का अंत इसके शीर्षक पर होता है। किशोरावस्था में कई बार हमें सही-गलत नजर नहीं आता और हमारे कुछ गलत फैसले हमें जीवन भर पछताने को मजबूर कर देते हैं। 16 बरस की उम्र में प्यार के नाम पर कहानी के पात्र कुछ ज्यादा ही आगे निकल पड़ते हैं। ये गलतियां ऐसे जख्म देती है, जो जिंदगी भर नासूर बने रहते हैं। अंत में हाथ क्या लगता है....यह कहानी पढ़कर जानना रोचक होगा। 
आगे पढ़ें

सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!