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Bhakt Soordas and brij

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कृष्ण वात्सल्य की रौशन आस... सूरदास

दीपाली अग्रवाल काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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प्रभु जी मेरे अवगुन चित्त न धरौ
इक लोहा पूजा में राखत इक घर बधिक परौ।
पारस भेदभाव नहिं मानत कंचन करत खरौ।


ईश्वर के समक्ष अपनी भावनाओं को प्रकट करने के लिए भक्त अक्सर सूरदास के इन पदों को गाते हैं। वही सूरदास जो कृष्ण के अनन्य अनुरागी हैं और जिनके काव्य में अपने इष्ट के लिए विशेष अनुराग नज़र आता है। सूरदास कृष्ण भक्तों की श्रृंखला में अग्रगण्य हैं तो ये भी अवश्यंभावी है कि कृष्ण की नगरी के वासी जो स्वयं भी कृष्ण के उपासक हैं, उनको सूरदास के प्रति लगाव हो। मैं भी मथुरा के उन्हीं लोगों में से एक हूं जिन्हें कृष्ण की उपासना करने का सौभाग्य उनके शहर की तरफ़ से उपहार स्वरूप मिला है और उस उपहार के साथ सूरदास जैसे अन्नय प्रभु-भक्त की कृष्ण संबंधी कथाएं भी मिली हैं।

उनके पदों को पढ़कर कान्हा की बंसी की टेर सुनाई देती है और चूंकि मैं भी एक बृजवासी हूं, मुझे ये टेर और भी गहराई से सुनाई देती है। सूर मथुरा- वृन्दावन की गलियों में घूमे या नहीं और उन्होंने गोवर्धन गिरी की कितनी परिक्रमा कीं, यह सिर्फ किताबों में जानने-पढ़ने को मिलता है लेकिन यह जानना कहीं भी महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि मुझ जैसे साधारण कृष्ण भक्त के लिए उन्होंने अनेक पद लिख दिए हैं जिससे मेरी ईश-श्रृद्दा को और भी प्रगाड़ता मिलती है इसलिए सूर के जन्म संबंधी अनेक मत होेने के बाद भी उन पर बृज क्षेत्र अपना अधिकार सुनिश्चित कर सकता है।

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