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Gopal das neeraj and etawah

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स्मृति शेष: नीरज जी का महाप्रयाण- गीत युग का अवसान

कवि कमलेश शर्मा

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गीत ऋषि श्रद्धेय नीरज जी का संसार से विदा लेना हिंदी जगत को कभी न भरी जा सकने वाली रिक्तता दे गया । वह स्वयं में गीतों का एक युग थे । उनका महाप्रयाण गीत युग का अवसान प्रतीत हो रहा है । उन जैसा गीतकार न तो हुआ और न होने की संभावना है । 
अपने बचपन की धुँधली यादें ताज़ा हो गई जब भिण्ड मेला के भीड़ भरे कवि सम्मेलन में निराला बिहार रंग मंच पर नीरज जी के गीतों पर विशाल जनसमूह को झूमते देखता था । कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उनके सानिध्य में काव्य मंच पर काव्य पाठ करने का सौभाग्य भी प्राप्त होगा । जब मैं अपनी जन्मभूमि भिण्ड (म.प्र.) से अपनी प्रथम कर्मभूमि करहल जनपद मैनपुरी (उ.प्र) में आकर बसा तो श्रद्धेय नीरज जी को हर वर्ष मैनपुरी के श्रीदेवी मेला तथा इटावा नुमाइश के मंच पर गीत गंगा प्रवाहित करते देखने का सुख अनवरत मिला।  8 अप्रैल 1997 की वह तिथि कभी विस्मृत नहीं हो सकती जब श्रीदेवी मेला मैनपुरी के उस कादंबरी मंच पर मैं पहली बार आमंत्रित कवि के रूप में उपस्थित था जहाँ महाकवि नीरज मंच की शोभा बढ़ा रहे थे। मैं मंच पर नवजात शिशु की तरह था जिसे कविता का क ख ग भी नहीं आता था ( यद्यपि कविता को आज भी एक विद्यार्थी के रूप सीखने के क्रम में ही हूँ) और उस मंच पर कविता के हिमालय नीरज जी बैठे थे । मैं मंत्रमुग्ध से उन्हें मंच के एक कोने से अनवरत निहार रहा था और यह कल्पना कर अभिभूत था कि महाकवि नीरज जी के साथ आज मंच साझा कर रहा हूँ ।
आरंभिक कवि के रूप में मेरा काव्य पाठ हुआ । श्रोताओं के भरपूर प्यार मिला । लेकिन मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब काव्य पाठ कर मैं मंच के कोने पर अपने पूर्व के स्थान पर बैठ गया तो आदरणीय नीरज जी ने हाथ के इशारे से मुझे अपने पास बुलाया और मेरे सिर पर हाथ फिराते हुए कहा "अच्छा लिखते हो और पढ़ते भी अच्छा हो खूब मेहनत करना" वह ग्यारह शब्द मेरे कानों में अमृत के समान प्रवेश कर गए। चरणस्पर्श कर मैं अपने स्थान पर आकर बैठ तो गया पर मन ही मन फूला नहीं समा रहा था अपने सौभाग्य पर कि नीरज जी जैसे महान कवि का आशीष मिला। इतने उदार थे आदरणीय नीरज जी। अपने छोटों को प्यार लुटाने उन्हें प्रोत्साहित करने में। 
इसके बाद तो उनके सानिध्य में इटावा, लखनऊ मैनपुरी सैफई इंदौर भिण्ड देवा शरीफ बलिया भोपाल ग्वालियर आदि अनगिनत मंचों पर अनगिनत बार कविता पाठ का सुअवसर मिला। हर बार स्नेहासिक्त आशीष। भाषा संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में उनके सानिध्य में आयोजित भाषाई सेमीनारों और कवि सम्मेलनों में अनेक बार उनका स्नेहिल सानिध्य मिला। जब इटावा आकर में बस गया तब से इटावा हिंदी सेवा निधि, सैफई महोत्सव और इटावा नुमाइश के मंचों भरपूर सानिध्य लगातार मिला और आशीष भी। इतने बड़े कवि होने के बावजूद इतने सरल और सहज कि हर छोटे बड़े कवि की उनतक पहुँच आसान थी। इटावा से तो उन्हें अतिरिक्त लगाव था, जन्मभूमि जो थी। इटावा जब आते पुराने संस्मरण अवश्य साझा करते थे और मेरे जैसे युवा रचनाकार मंत्रमुग्ध से उन्हें सुनते रहते। 
वे इस संसार से महाप्रयाण अवश्य कर गए हैं पर कानों में अब भी उनकी आवाज़ गूंज रही है ....... "नीरज को बुलाया जाए", मन मेरा ही क्या सभी का कर रहा है कि नीरज को बुलाया जाए पर यही तो बिडम्बना है कि अब वह सशरीर कभी हमारे बीच नहीं आ सकेंगे लेकिन यह भी उतना ही सच है कि गीतों के माध्यम से वह हमारे बीच से कभी जा भी नही सकेंगे । 

- कवि कमलेश शर्मा 
इटावा (उ.प्र.)
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