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Tabish sultanpuri ghazal

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ताबिश सुल्तानपुरी की ग़ज़लों में ‘प्रेम’ की अभिव्यक्ति

डॉ.अरुण कुमार निषाद, सुल्तानपुर

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बहू बेगम, ताजमहल, चौदहवीं का चाँद, साहब बीबी और गुलाम, दिल दौलत दुनिया, अली बाबा चालीस चोर और सइयां मगन पहलवानी मा जैसी फिल्मों के संवाद लेखक/निर्देशक ताबिश सुल्तानपुरी का जन्म 20 मई 1927 ई. को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जनपद के तियरी गाँव में हुआ था। आप कुर्ला मुम्बई शाखा के प्रगतिशील लेखक संघ के तीन दशक तक अध्यक्ष रहे। आपका निधन 1 जनवरी 1987 ई. को सुल्तानपुर के अंगनाकोल (सुल्तानपुर मुख्यालय से 5 किलोमीटर सुल्तानपुर फैजाबाद मार्ग पर) नामक गांव में हुआ। ताबिश सुल्तानपुरी की पुस्तक ‘दोपहर के फूल का उर्दू संस्करण 1977 ई. में प्रकाशित हो गया था। इसका हिन्दी संस्करण 2015 ई. में प्रकाशित हुआ, इनका एक और ग़ज़ल संग्रह ‘शब-ता-शब’ जल्द ही आने वाला है।

ताबिश सुल्तानपुरी का भी मानना है कि मनुष्य का जो यौवन है वह बहुत दिनों तक स्थायी रहने वाला नहीं है। नायिका को सम्बोधित करते हुए नायक कहता है कि-

यौवन धन है लुट जायेगा गोरी कुछ तो दान करो
मत निस-दिन फेरे लगवा कर जोगी को हलकान करो
नटखट हैं सब ग्वाले कोई ले भागा तो क्या होगा
घाट पे रख कर चीर न राधे जमुना में अस्नान करो
प्रेम पवन का झोंका हूँ मैं रूप कमल की खुशबू तुम
मेरे साथ उड़ो और सारी दुनिया पर एहसान करो

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यूं नज़र उसने मिलाई है कि जी जानता है

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