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Abhimaan

मेरे अल्फाज़

अभिमान

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बार बार अन्तस को
अधजला छोड़ देते हो तुम,
उन दो टूक शब्दों में
तेज़ाब लगाकर...!
रक्तमई आँखों से
झर झर बहते हैं
रक्तिम जलधारा अक्सर..!
फिर सुलगती अलाव सी
हो जाती है वह स्पष्ट अंगारों
सी आवाज़ें,
जो धधकती हैं मेरे कानों में
हर्फ़ दर हर्फ़...!
तमस फैलता है जब
नज़रों के सामने
होती फिर जिव्हा गूँगी
फफोले देते जख़्म
टपकाते हैं फ़िर लार
नफरत की...!
सुनो जो लिए फ़िरते हो
तेज़ाब दिमाग़ में
तभी तो राख झरती है
तुम्हारे बदन से...!
फिर रक्तस्त्राव होता है
और ढहने लगती है
वह कुंद मानसिकता
एक बदबूदार रिसाव के साथ
जिसे तुम #अभिमान कहते हो...

- स्वरा

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