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Darr

मेरे अल्फाज़

शहनाई से डर लगता है

रवि ठाकुर

5 कविताएं

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दिल में बजती हुई शहनाई से डर लगता है।
ऐ हुजुर मुझे तो रूसवाई से डर लगता है।।

गमों की तो मैं कोई परवाह नहीं करता।
मुझको तो बस अपनी तन्हाई से डर लगता है।।

लिखता रहता हूँ मैं अल्फाज मोहब्बत के।
कागज पे बिखरी हुई रौशनाई से डर लगता है।।

एक गरीब बेचारा खुशियां भी नहीं खरीद सकता।
मुझे तो इस दौर की मँहगाई से डर लगता है।।

दरिया मिलकर भले ही एक समन्दर बनाते हों
मुझे तो उस कतरे की गहराई से डर लगता है।।

झूठे वादे भी जरूरी हैं सियासत के लिये
मगर यार ! सियासत को भी सच्चाई से डर लगता है।।

- रवि ठाकुर

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