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मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल: वफ़ाएँ भी होंगी, जफ़ाएँ भी होंगी

L.J. Bhagia

57 कविताएं

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वफ़ाएँ भी होंगी,जफ़ाएँ भी होंगी
क़यामत के दिन तक ख़ताएँ भी होंगी

रहे-दिल नहीं सुर्ख़ क़ालीन यारो
तेरी राह में सद बलाएँ भी होंगी

फ़िज़ा ख़ुशनुमा है,ये दिल भी जवाँ है
सनम आ गये तो ख़ताएँ भी होंगी

कभी दिल भर आयेगा कुछ याद करके
कभी दिल में यारो ख़लाएँ भी होंगी

अदालत,वकील और मुंसिफ़ रहेंगे
यहाँ जुर्म होंगे,सज़ाएँ भी होंगी

मेरे जीते जी दूर चाहे रहें वो
रहेंगे न हम जब दुआएँ भी होंगी

मुहब्बत में नफ़रत भी शामिल यहाँ है
मिली गर दुआ बददुआएँ भी होंगी

मुहब्बत में दर्द-ओ-अलम तो मिलेंगे
मगर दर्दे-दिल की दवाएँ भी होंगी

नज़र गुफ़्तगू करती है आशिक़ी में
उन आँखों में यारो सदाएँ भी होंगी

सफ़र ख़ूबसूरत है 'ख़ामोश' माना
मगर राह में कुछ बलाएँ भी होगी


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