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Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   कहने को घर नहीं, सारा जहान हमारा है।

मेरे अल्फाज़

बेघर

vivek mishra

1 कविता

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जब से हुआ है भारी ये ऐलान हलकों में,
कोई भी निकले नहीं बाहर सब रहें अपने घरों में.
है महामारी एक कोई निकली हवाओं में,
जहर फैला दिया उसने है दुनिया की फिजाओं में।
तब से बदहालियत पर अपनी कुछ और रंज होता है,
बेघर तो था मैं पहले से अब पता चला कि बेघर क्या होता है।

नहीं थी दरकार कोई छत मिले या ना मिले मुझको,
कि मैंने आसमा ओढा, औ सेहन ज़मीं को बनाया था।
हो मलंग फिरता था मैं इन कूंचा-ए-शहरों में,
बेघर तो था फकत बस नाम का,
कि मैंने दुनिया को ही अपना घर बनाया था।
जो जितने भी दिखा करते, यहां सब चमकते हुए चेहरे।
सभी को सजा के अपने जहन में,
मेरा कुनबा सजाया था।

के सभी जब छुप गए अपने बनाए आशियानों में,
न निकला एक भी कोई कई दिन इन वीरानों में
रह गया तनहा यहां पर बस अकेला मैं,
अचानक ढह गई जो बरसों से ताबीर थी मन में।

कि ओढूं क्या मैं अब,और क्या बिछाऊं मैं।
बताओ कहां जा कर, यह अकेला सर छुपाऊं मैं
पहले था बेघर तो जहां को घर बनाया था
अबके हुआ तो, इससे बड़ी क्या सोच लाऊं मैं?
मैं बचूंगा या मरूंगा इसका नहीं सदका
सदका है कि फिर कैसे यह नंगापन छुपाऊं मैं

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