आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   ZINDGI JEENE KA KOI MAN NAHIN RAHA

मेरे अल्फाज़

ज़िन्दगी जीने का कोई मन नहीं रहा

Zafaruddin Zafar

166 कविताएं

481 Views
ज़िन्दगी जीने का कोई मन नहीं रहा,
लहज़े में उसके अपना पन नहीं रहा।

चुपके चुपके रात को रोता हूँ इसलिए,
तन्हाइयों से लड़ने का फ़न नहीं रहा।

देखे तो सही कोई,मैं खुली किताब हूँ,
मेरे दिल में कभी कालापन नहीं रहा।

वो समझे ही नहीं अलग बात है मगर,
मेरे चेहरे में कोई दोहरापन नहीं रहा।

वक़्त की आंधी में बिखरती चली गईं,
एक भी हसरत में ठहरापन नहीं रहा।

झूलों से मुंह फेरना पड़ गया इसलिए,
मेरी ज़िन्दगी में अब सावन नहीं रहा।

वो किसी के ख़्वाब में खोया था मगर,
मेरे मिलने में कोई अधूरापन नहीं रहा।

ज़लालत ने बेशक जज़्बात मार डाले,
मगर मेरे कानों में बहरापन नहीं रहा।

ज़फ़र धूप उतर कर आए किस तरह,
घरबार के बंटवारे में आंगन नहीं रहा।

-ज़फ़रुद्दीन"ज़फ़र"
एफ-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!