आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mud Mud Ke Dekhta Hu ›   sudhish pachauri says this thesis is selling and being propagated that hindu is threatened
सुधीश पचौरी और अशोक वाजपेयी

मुड़ मुड़ के देखता हूं

सुधीश पचौरी उवाचः  हिंदू चित्त की उदारता विदा हो रही है

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

829 Views
सुप्रसिद्ध मीडिया समालोचक और लेखक सुधीश पचौरी का मानना है कि  हिंदुओं में विक्टिमहुड का विचार समा गया है। वे खुद को उत्पीड़ित मान रहे हैं और इससे उनकी उदारता और सहनशीलता विदा हो रही है। 

पिछले दिनों अमर उजाला बैठक में श्री अशोक वाजपेयी के साथ आमंत्रित श्री पचौरी ने अपने ये विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में हिंदू मानस  ख़ुद को उत्पीड़ित मान रहा है। इसका फायदा भी उठाया जा रहा है। इस विचार को नीचे तक ले जाया गया है और दिनरात ले जाया जा रहा है। पचौरी का कहना है कि उस लिहाज से ये थीसिस या स्थापना बिक रही है कि हिंदू ख़तरे में हैं। इससे हिंदूओं में संकुचन पैदा हो रहा है। हिंदू संकीर्ण हो रहा  है। उसके मिज़ाज की जो उदारता और सहनशीलता थी वो जा रही है। और ऐसा भाव ही वह कच्चा माल है जिससे 50 किस्म के तानाशाह तैयार हो रहे हैं। सुधीश पचौरी ने कहा, "मेरा काम फोटो खिंचवाना नहीं है। मैं अगर कलम का धनी हूं तो मुझे कलम चलाना चाहिए। मेरी मानें तो आज की तारीख़ में असली अखाड़ा हिन्दू समाज है मुसलमान समाज नहीं है। हमें हिंदू समाज के भीतर ही प्रश्नवाचन करना है।" 

इस संदर्भ में सुधीश पचौरी ने एक वाकये के बारे में बताया। एक सेक्युलर मंच ने उन्हें बोलने के लिए बुलाया था। उसमें स्टेज पर जाकर सुधीश जी ने सहज भाव से कहा कि हिंदू चित्त से उदार होता है। वही व्यक्ति और कामरेड जिन्होंने उन्हें बोलने के लिए बुलाया था कहने लगे कि आप ऐसा नहीं बोल सकते। पचौरी ने कहा, "क्यों नहीं बोल सकता, तुम ही बुला कर लाए हो एक वाक्य भी बोलने नहीं दे रहे। मैं सेकुलर हूं और पुराना मार्क्सवादी भी। मैं क्यों नहीं बोल सकता। लेकिन वे रोकते रहे।" 

सुधीश जी के मुताबिक उस कथित सेकुलर मंच के प्रतिनिधि की तरह यह तानाशाह होने का भाव नीचे तक चला गया है। और ऐसे ही व्यक्ति दूसरों का तानाशाह बताने पर तुले रहते हैं। सुधीश जी ने कहा, "तानाशाह तो तुम हो वो थोड़े ही हैं। तानाशाह होने का ये भाव धार्मिक समूहों में उतना ही है, जातीय समूहों में भी उतना ही है। इसलिए मेरा सवाल है कि असली अखाड़ा हिन्दू समाज है।" 

पचौरी ने कहा, "जब  कोई आइडेंटिटी या अस्मिता ढूंढी जाती है, तो आक्रांत होने के अनुभव के बिना कोई भी समूह या कोई भी नेता किसी अस्मिता का निर्माण नहीं कर सकता। जब मैं ये कहता हूँ कि हिन्दू अस्मिता का जो केंद्रवाद है वो नए सिरे से संगठित किया जा रहा है, बार बार संयोजित किया जा रहा है, और बताया जा रहा है कि ये हिन्दुत्व नहीं है, तो इस प्रक्रिया से उसे अलहदा किया जा रहा है काट के अलग किया जा रहा है, ऐसे प्रयास लगातार हो रहे हैं। सड़क पर उनका शासन है जो बहुमत में है और क़ानून में संविधान की दुहाई, दोनों एक साथ हो रहा है।" 

सुधीश पचौरी कहते हैं कि वे ये सवाल करेंगे कि क्या हिन्दू का चित्त तानाशाह है? क्या उसमें ऐसे तत्व हैं कि वो तानाशाह बन जाए? इसका जवाब वे ख़ुद ही देते हैं। वह कहते हैं कि हिंदू मानस अपनी बनावट में ऐसा है कि उसमें तानाशाही के लिए गुंजाइश ही नहीं है। उसमें तो हर चीज़ में बहुलतावाद है। हिन्दू समाज में अनंत विविधताएं हैं। यह हिंदुओं के लिए ही ख़तरा है कि वे एक रंग की चड्डी पहने या एक ही रंग का तिलक लगाएं। पचौरी मथुरा से ताल्लुक रखते हैं और कहते हैं कि यदि आप वृंदावन चले जाइए तो आप देखेंगे कि वहां 50 तरह के तिलक हैं। हर आदमी वहां तिलक से पहचाना जाता है। अस्मिताओं के अंदर उप-अस्मिताएं मौजद हैं जो बहुत महत्वपूर्ण कारक हैं। यह धारा आमतौर पर कहती है नेति, नेति यानि ये भी नहीं, ये भी नहीं, ये भी नहीं...। विविधता को और बहुलता को इतना स्पेस देने वाले हिंदू मानस में तानाशाही हो कैसे सकती है? यहां तो ‌इतनी कैजुअल अप्रोच है कि किसी एक देवता को भी बहुत दिन तक लादे नहीं रखते। हर तीसरे दिन एक देवता की पूजा करते हैं और फिर उसका विसर्जन कर आते हैं। 

मुस्लिम अल्पसंख्यकों के संदर्भ में पचौरी बताते हैं कि उनके बहुत से मित्र मुस्लिम हैं इसलिए वे मुस्लिम अल्पसंख्यकों को बहुत नज़दीक से जानते हैं। पचौरी बताते हैं, "मुस्लिमों को भी नहीं पता कि इस्लाम के सिद्धांतो में यह भी एक सिद्धांत है, गजवा-ए-हिंद। हमारे सेकुलरों को तो मालूम ही नहीं क्योंकि वे पढ़ते ही नहीं। अकेले गिरिलाल जैन थे तो इस्लाम पर लगातार लिखते और पढ़ते थे। गजवा-ए-हिंद का मतलब होता है हिंद पर हुकूमत लाना। ये आज भी लिखा हुआ है। सवाल ये है कि अगर गजवा-ए-हिंद करना है तो इसके ठीक उलट है वो हिंदू जो गजवा-ए-हिंद करना चाहता है। यह सीधी लेन-देन है। इसका सीधा मतलब है कि एक तरह का फंडामेंटलिज़्म यानि कट्टरवाद दूसरे तरह की कट्टरवाद को ताक़त देता है। इस्लामिक कट्टरवाद हिंदू कट्टरवाद को ताक़त दे रहा है और हिंदू कट्टरवाद इस्लामिक कट्टरवाद को ताक़त दे रहा है।" 
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!