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विश्व काव्य

गीतिका

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शारदे ने जो दिया उपहार लिखता हूं।
लेखनी को मैं बना हथियार लिखता हूं।।1

ध्यान मैं देता नहीं हूं हर किसी पर अब,
काम जो आता उसे सरकार लिखता हूं।

स्वार्थ प्रेरित हो मनुजता तोड़ देती दम,
तब उसे छल दंभ का संसार लिखता हूं।

हों इकट्ठे जिस जगह पर चाटुकारी सब,
उस जगह को मैं सदा दरबार लिखता हूं।

काम होता अर्थ हित ही इस जगत में जो,
तोड़ बंधन मैं उसे व्यापार लिखता हूं।

जो बुलाए मान दे बिन लाभ को सोचे,
बस उसी संबंध को सत्कार लिखता हूं।

कर्म का पालन करे जो पूर्ण निष्ठा से,
मात्र उसके ही यहां अधिकार लिखता हूं।

प्रेम की गंगा बहे जब शुद्ध पावन हो,
हो खुशी भरपूर तो त्यौहार लिखता हूं।

लड़ बुराई से कभी विचलित नहीं होता,
इसलिए मैं सत्य को हर बार लिखता हूं।

- डाॅ. बिपिन पाण्डेय

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