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जब हिज्र के शहर में धूप उतरी मैं जाग पड़ा तो ख़्वाब हुआ : मोहसिन नक़वी

विश्व काव्य

जब हिज्र के शहर में धूप उतरी मैं जाग पड़ा तो ख़्वाब हुआ : मोहसिन नक़वी

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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जब हिज्र के शहर में धूप उतरी मैं जाग पड़ा तो ख़्वाब हुआ 
मिरी सोच ख़िज़ाँ की शाख़ बनी तिरा चेहरा और गुलाब हुआ 

बर्फ़ीली रुत की तेज़ हवा क्यूँ झील में कंकर फेंक गई 
इक आँख की नींद हराम हुई इक चाँद का अक्स ख़राब हुआ  आगे पढ़ें

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