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विस्लावा शिम्बोर्स्का

विश्व काव्य

विस्साव शिम्बोर्स्का की कविता: यातनाएँ

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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बदला कुछ भी नहीं
यह देह उसी तरह दर्द का कुआं है
इसे खाना, सांस लेना और सोना होता है
इस पर होती है महीन त्वचा
जिसके नीचे ख़ून दौड़ता रहता है।
इसके दांत और नाख़ून होते हैं
इसकी हड्डियां होती हैं जिन्हें तोड़ा जा सकता है
जोड़ होते हैं जिन्हें खींचा जा सकता है। आगे पढ़ें

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