दो अवधी किताबों का हुआ विमोचन

नीरज 'अम्बुज'/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 28 Jul 2014 10:17 AM IST
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अवधी को समृद्ध बनाने में तुलसीदास, मलिक मोहम्मद जायसी के बाद पढ़ीस, वंशीधर और फिर रमई काका की भूमिका ऐतिहासिक रही है।
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उन्होंने न केवल अवधी भाषा को विकसित करने में योगदान दिया, बल्कि अवधी साहित्य को नई ऊंचाईयों तक पहुंचा।
उनका साहित्य गांवों, कृषकों और अभावग्रस्त लोगों के हित से जुड़ा रहा है।
ये विचार रविवार को साहित्य अकादमी, दिल्ली और अवध भारती संस्थान की ओर से जयशंकर सभागार में आयोजित रमई काका के जन्म शताब्दी समारोह में ‘अवधी के उन्नयन में रमई काका का योगदान’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने कहीं।

शताब्दी वर्ष फरवरी 2015 तक चलेगा। इस अवसर पर जगदीश पीयूष की पुस्तक ‘अवधी साहित्य सर्वेक्षण और समीक्षा’ तथा राजेंद्र कृष्ण श्रीवास्तव द्वारा संपादित ‘साहित्य प्रोत्साहन’ के रमई काका विशेषांक का लोकार्पण भी हुआ।

मुख्य अतिथि रमई काका के बड़े बेटे प्रो. अरुण त्रिवेदी ने कहा कि रमई काका के साहित्य का अवध के गांवों से गहरा जुड़ाव है, जिसकेकेंद्र में हैं कृषक।

काका परिष्कृत शिल्प के कवि थे। इसीलिए क्षेत्रीय भाषा के कवि होने के बावजूद उनका परचम साहित्य में बुलंद है।

अवध ज्योति पत्रिका के संपादक डॉ. रामबहादुर मिश्र ने कहा कि काका ग्रामीण व्यवस्था व शोषण के खिलाफ  आवाज उठाने वाले कवि थे।

उनके हृदय में दीन-हीन कृषकों, मजदूरों व अभावग्रस्त लोगों के लिए सहानुभूति थी।

इस दौरान, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के हिंदी सलाहकार मंडल संयोजक प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित, आकाशवाणी की कार्यक्रम अधिशासी डॉ. अनामिका श्रीवास्तव, ‘बोली बानी’ के संपादक जगदीश पीयूष सहित और कई लोग मौजूद रहे।
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