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हैदराबाद में हैवानियत पर गुस्से में राजधानी: सिर्फ सुरक्षा नहीं बेखौफ आजादी की हकदार हैं बेटियां

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Wed, 04 Dec 2019 07:22 PM IST
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अपराजिता 100 मिलियन स्माइल्स के तहत आयोजित ग्रुप डिस्कशन में शामिल शहर की प्रबुद्घ महिलाएं।
अपराजिता 100 मिलियन स्माइल्स के तहत आयोजित ग्रुप डिस्कशन में शामिल शहर की प्रबुद्घ महिलाएं। - फोटो : amar ujala
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हैदराबाद में बिटिया के दुष्कर्म व हत्याकांड से साबित हो गया कि निर्भया की मौत पर आक्रोश से आया बदलाव स्थायी नहीं रहा। उम्मीद थी कि नया कानून लोगों में डर पैदा करेगा, पर ऐसा नहीं हो सका। हैवानियत में कमी नहीं आई है। बेटियों का राह चलना मुश्किल है। माताएं डरी हुई हैं। हैदराबाद में डॉक्टर की रेप के बाद हत्या ने फिर साबित कर दिया कि दहशतगर्दी चारों तरफ है। इस घटना से राजधानी भी गुस्से में है। अमर उजाला कार्यालय में अपराजिता 100 मिलियन स्माइल्स के तहत आयोजित फोकस ग्रुप डिस्कशन में शामिल महिलाओं ने कहा कि कब तक निर्भया जैसी घटनाएं होती रहेंगी। कार्यक्रम की अध्यक्षता सोशल वर्कर ताहिरा हसन ने की।
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जवाबदेही के बगैर कुछ नहीं बदलने वाला
ताहिरा हसन का कहना है कि निर्भया कांड के बाद जस्टिस वर्मा कमेटी द्वारा लाए गए कानून के बाद कौन से सख्त कानून की मांग की जा रही है। पहले जो इतना अच्छा और मजबूत कानून है, उसे लागू तो करें। तीन हजार करोड़ रुपया जो इस कानून के बनने के बाद महिला सुरक्षा व न्याय दिलवाने के लिए आवंटित किया गया था, उसका केवल आठ फीसदी ही इस्तेमाल हुआ। जिम्मेदारों की जवाबदेही जब तक तय नहीं होगी, तब तक कुछ नहीं बदलने वाला है।

कदम अंतरिक्ष की ओर, फिर भी महिलाएं सुरक्षित नहीं
सलोनी केसरवानी के अनुसार, जो दर्दनाक घटना हुई है उससे हर महिला के भीतर आक्रोश है। हम इस मंच से अपनी बात को हर किसी तक पहुंचाना चाहते हैं कि हमें सिर्फ सुरक्षित माहौल चाहिए। एक तरफ हम अंतरिक्ष में कदम रख रहे, हाईटेक दुनिया हो चुकी है, इसके बावजूद घर से निकली महिला का पति फोन करके पूछता है कि पहुंच गई ना। महिलाओं को हर वक्त अपने पास अपनी सुरक्षा के लिए स्प्रे रखना पड़ता है। मेरा सवाल है क्यों इतनी डरी हैं महिलाएं।

नए भारत में सुरक्षित क्यों नहीं बेटियां
सुमन रावत का कहना है कि एक तरफ हम न्यू इंडिया की बात कर रहे हैं। दूसरी तरफ बहन-बेटियां सुरक्षित नहीं हैं। एक तरफ एक घटना होती है, दोषी को पकड़ा भी नहीं जाता या सजा भी नहीं हो पाती और महज चार-पांच दिन के भीतर फिर एक हैवानियत सामने आ जाती है। बहुत अफसोस के साथ और दिल की असीम गहराईयों के दुख के साथ मैं यह पूछना चाहती हूं उनसे जो जिम्मेदार हैं, जिनके ऊपर सबकी रक्षा का जिम्मा है, वे कब आश्वस्त करेंगे हमें कि हम सब सुरक्षित हैं।

महिला आयोग, जिम्मेदारों को सोते से जगाना होगा
शालिनी श्रीवास्तव के मुताबिक, महिला आयोग को, जिम्मेदारों को सोते से जगाना होगा। निर्भया कांड इसका उदाहरण है। यह तो तय है कि दावे होते हैं, पर असर नजर नहीं आता है। ऐसे सख्त कानून हों कि डर पैदा करें। कहा तो जाता है, लेकिन हो कुछ नहीं हो रहा है। महिलाओं को आगे आना होगा। उन्हें यह अधिकार हासिल करना होगा कि उनके खिलाफ अपराध होने पर तत्काल कार्रवाई हो। कार्रवाई में ढिलाई से भी हैवानों का हौसला बढ़ता है।

जिम्मेदार लोगों की सक्रियता बढ़ाई जाए
मानसी प्रीत जस्सी के अनुसार, बात आती है जब महिला की अस्मिता की, सबसे पहले आवाज महिलाएं ही उठाती हैं ताकि हम सब सुरक्षित हों, बेखौफ होकर आगे बढ़ सकें। हैदराबाद में इतना सबकुछ हो गया, जिम्मेदारों की भूमिका संतोषजनक नहीं है। जिस तरह के एक्शन की हम उम्मीद करते थे, वैसा कहीं कुछ नहीं। ऐसे में हम सब की जिम्मेदारी बनती है कि हम बार-बार अपनी आवाज उठाते रहें, जिम्मेदार संस्थाओं को जगाते रहें, बताते रहें कि उन्हें क्या करना है।

अब बहुत हो गया, और नहीं
ओम कुमारी सिंह का कहना है कि अंदर तक झकझोर देने वाली घटना है। हर महिला को अपनी रक्षा खुद करनी होगी। लगने लगा है कि हथियार लेकर चलना चाहिए महिलाओं को। दोषियों को सजा देना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। हमें खाड़ी देशों से सीखना चाहिए और दुराचारियों से उसी तरह का सख्त व्यवहार करना चाहिए। जब तक दोषियों को सजा का डर नहीं होगा, तब तक वे हैवान की तरह पेश आते रहेंगे। हम महिलाएं इस दहशतगर्दी से आजादी चाहती हैं, अब बहुत हो गया।

त्वरित कार्रवाई और त्वरित सजा
उषा अग्रवाल के अनुसार, इस तरह की घटनाएं हम सबको सुनाई देती हैं। हर बार विरोध होता है, प्रदर्शन होता है। इसके बावजूद घटनाएं होती रहती हैं। निर्भया जब हुआ तो किस कदर लोगों का आक्रोश फूटा। हालांकि इसका नतीजा जस्टिस वर्मा कमेटी की सिफारिश के रूप में सामने आया। पर कानून को सख्ती से लागू हुआ हो, ऐसा नहीं लगता। है। हर घटना के बाद दोषी को नाबालिग-बालिग साबित करने वालों की भीड़ उमड़ पड़ती है। त्वरित कार्रवाई और त्वरित सजा के बिना कुछ नहीं होगा।

चौबीस घंटे में सजा तय हो
अंशू भल्ला ने बताया कि फास्ट ट्रैक की बातें हम लंबे समय तक सुनते आ रहे हैं। जुर्म सामने है तो हम किस बात का इंतजार कर रहे होते हैं। आखिर क्यों नहीं हम 24 घंटे में सजा सुनाते हैं। निश्चित तौर पर जिसने एक बार हैवानियत दिखाई, वह आजाद होने के बाद फिर वही करेगा। कानून ऐसा होना चाहिए जो सिर्फ जुर्म देखे और उसे करने वाले को सख्त से सख्त सजा दी जाए।

हम खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे
सीमा अग्रवाल के अनुसार, जो कुछ भी हैदराबाद में हुआ और जो लगातार हो रहा है, उसे सुन-सुनकर हम लोग डरे भी हैं। अपनी बेटियों को लेकर, उनकी सुरक्षा को लेकर हर पल हमारे मन में सवाल रहते हैं। बच्चियों को अकेले छोड़ने में डर लगता है। एक तरफ हम सशक्तीकरण, बेटियों को आगे बढ़ाने की बात कर रहे हैं तो दूसरी तरफ हम सुरक्षा के डर से उनका रास्ता रोक रहे हैं।

हम कहां जाएं आखिर
प्रियंका गर्ग के मुताबिक, यह सब सुन-सुन कर घबरा गए हैं। हर पल एक घबराहट सी रहती है। एक तरफ तो हम लोग बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं। बेटियों से अपेक्षा है कि वे चांद पर जाएं, वे ऐसा कर भी रही हैं। इसके बावजूद वे सुरक्षित क्यों नहीं हो सकती हैं। हम आखिर जाएं कहां, जिम्मेदार इसका जवाब दें।

बच्चों को गेट बाहर भेजने से डरते हैं
रश्मि सिंह के अनुसार, हालात इतने बदतर हो गए हैं कि बच्चों को गेट से बाहर भेजने में डर लगता है। क्या कभी किसी ने सोचा है कि 1.5 जीबी डेटा जो दिया जा रहा है, उसका इस्तेमाल कहां हो रहा है। इसकी मॉनीटरिंग के लिए सेल क्यों नहीं है। क्या देखा जा रहा है, इसकी निगरानी क्यों नहीं होती है। कानून कई मुद्दों पर लचर और लाचार है। जरूरत है कि इसे हर हाल में सख्त बनाया जाए। सभी महिलाएं एकजुट हो जाएं तो तस्वीर बदल सकती है।

हैवानियत के लिए सजा-ए-मौत
रुचि रस्तोगी के अनुसार, जिन-जिन की बेटियां बाहर पढ़ती हैं, सोचिए कि लखनऊ में बैठे अभिभावकों की हालत क्या होती होगी। हैवानियत के लिए हैवान अपराधी पर केस चलाने से बेहतर है कि उसे तत्काल सजा दी जाए वो भी मौत। एक धारणा सी बन गई है कि ज्यादा से ज्यादा क्या होगा जेल में डाल दिए जाएंगे, केस चलेगा। सोर्स-सिफारिश के बाद जमानत पर भी छूट जाएंगे। हैवानियत के लिए सजा-ए-मौत मिलनी ही चाहिए।

अपनी सुरक्षा खुद करें
रुचि जैन के मुताबिक, मैं अपने पास स्प्रे रखकर चलती हूं। दरअसल अब लगने लगा है कि हम सबको अपनी सुरक्षा खुद करनी होगी। शासन-प्रशासन से अब अपेक्षा की बात बेमानी है। कानून तो बने हैं और बनते रहते हैं। नए-नए नियम भी आते हैं, सवाल यह है कि यदि कानून है, सब कुछ महिलाओं के लिए हो फिर क्यों नहीं सुरक्षित हैं महिलाएं। मेरा सभी महिलाओं से कहना है कि अपेक्षाएं छोड़िए और खुद कीजिए अपनी सुरक्षा।

भेदभाव के खिलाफ सख्ती जरूरी
रीता मित्तल का कहना है कि यह बार-बार कहा जा रहा है कि लड़का-लड़की में भेदभाव की शुरुआत घर से होती है और घर से ही इसे खत्म करना होगा। दूसरा महिलाओं को खुद भी किसी से कमतर आंकना सही नहीं है। हां, सरकार के साथ-साथ हम लोगों को भी कदम से कदम बढ़ाकर चलना होगा। हम घर में बेटों को समझाएं। उन्होंने हर बात में बढ़ावा देना बंद करें।

झांसी की रानी की जरूरत
डॉ. राधा रस्तोगी के अनुसार, निर्भया के बाद फिर सब सो गए। कैंडल मार्च निकालने से कुछ नहीं होगा। दरअसल हम सबकी संवेदनशीलता मरती जा रही है। इसे जिंदा रखना होगा। यदि जिम्मेदार हमारी सुरक्षा करने में असमर्थ हैं तो हमें सौंप दें जिम्मेदारी। महिलाओं को अब फिर से झांसी की रानी जैसा बनना होगा। अपनी बेटियों की रक्षा का जिम्मा लेना होगा।

रसूखदारों के दामन खुद दागदार
उषा किरण का कहना है कि हाल ही में कुछ बड़े नाम ऐसे सामने आए, जिसमें रसूखदारों पर हैवानियत के इल्जाम लगे। सोचने वाली बात है कि जब ये लोग ही इसमें शामिल हैं तो फिर आम अपराधी क्यों डरेगा। कभी-कभी तो हम सब ये सोचते हैं कि हम किस समाज में रह रहे हैं, जहां महिलाओं की हर सांस दहशत में डूबी होती है।

बेटी के कारण मैं नौकरी नहीं कर रही
रागिनी श्रीवास्तव के अनुसार, हम आर्थिक सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता की बात करते हैं तो जरूरी है कि हर महिला अपने पैरों पर खड़ी हो। मैं चाहकर भी नौकरी करने का फैसला नहीं ले पा रही हूं। मेरी बेटी है और उसकी सुरक्षा को लेकर मैं हमेशा चिंतित व डरी-सहमी रहती हूं। मेरी तरह न जाने कितने माता-पिता होंगे जो डरे रहते हैं, बेटियों के लिए। यह डर आखिर कब खत्म होगा।

कानून के पालन में सख्ती में हिचक क्यों
डॉ. श्वेता श्रीवास्तव के मुताबिक, यह जो कुछ हुआ है जो लगातार होता रहा है। बहुत सी चीजें तो हमें पता ही नहीं चल पाती हैं। कानून में तो लिखा है कि सजा-ए-मौत है हैवानियत की सजा। क्यों इसे लागू करने में हिचक महसूस होती है। कभी हैदराबाद में तो कभी कन्नौज में तो कभी किसी चर्च में महिला से रेप हो जाता है। किस बात का इंतजार कर रहे हैं हम सब।
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