मध्य प्रदेश : शिवराज को विष, महाराज को अमृत, करीबियों को भी शामिल नहीं करा पाए सीएम

अमर उजाला नेटवर्क, भोपाल Updated Fri, 03 Jul 2020 02:00 AM IST
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शिवराज सिंह चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया
शिवराज सिंह चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया - फोटो : पीटीआई

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मध्य प्रदेश में मंत्रिमंडल विस्तार पर हुए गहन मंथन में निकला विष मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के हिस्से आया तो अमृत ज्योतिरादित्य सिंधिया ले उड़े। गुरुवार को जिन 28 मंत्रियों ने शपथ ली उनमें 12 पूर्व कांग्रेसी और 9 सिंधिया समर्थक हैं। ऐसे में शिवराज मंत्रिमंडल में सिंधिया समर्थक मंत्रियों की संख्या 11 हो गई। दूसरी ओर शिवराज अपने छह समर्थकों को ही अपनी टीम में जगह दिला पाए। यहां तक कि केंद्रीय नेतृत्व ने सीएम समर्थक रामपाल सिंह और गौरीशंकर बिसेन को भी मंत्री बनाने से मना कर दिया।
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विस्तार से पहले जारी माथापच्ची के दौरान शिवराज ने कहा था कि समुद्र मंथन में अमृत निकलता है। विष शिव को पीना पड़ता है। माना जा रहा है कि शिवराज ने विस्तार में अपनी न चलने के कारण इस आशय की टिप्पणी की थी। सूत्रों का कहना था कि बीते चार दिनों से शिवराज की कोशिश विस्तार में अपने समर्थकों को जगह देने की थी। मगर नेतृत्व ने इसे स्वीकार नहीं करते हुए उन्हें नए चेहरे को हर हाल में तरजीह देने का निर्देश दिया।
सिंधिया के साथ आए 22 में 11 बने मंत्री
शिवराज कैबिनेट में सिंधिया समर्थक तुलसी सिलावट और गोविंद सिंह पहले से ही मंत्री हैं। गुरुवार के विस्तार में उनके खेमे के नौ नेताओं को शामिल करने से यह संख्या 11 हो गई। सिंधिया के साथ 22 विधायकों ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा था। इनमें आधे मंत्री पद पा चुके हैं। बाकी को निगम-मंडल में पद देने की चर्चा है। मंत्रिमंडल में सीएम समेत 34 मंत्री हैं। इनमें 14 पूर्व कांग्रेसी हैं। इस तरह पूर्व कांग्रेसी नेताओं की हिस्सेदारी 41 फीसदी हो गई है।

अपनों को नहीं मिल पाई तरजीह
सिंधिया समर्थकों को शामिल करने की कोशिश में भाजपा के पुराने नेताओं को मंत्री पद से वंचित रहना पड़ा है। राजेंद्र शुक्ला, रामपाल सिंह, गौरीशंकर बिसेन जैसे वरिष्ठ नेता मंत्रिमंडल का हिस्सा नहीं बन पाए। ये सभी शिवराज के करीबी हैं और पहले उनके मंत्रिमंडल का हिस्सा रह चुके हैं। इस बार भी इनकी दावेदारी मजबूत थी।

शिवराज ने इनको मंत्री बनाने के लिए हरसंभव कोशिश की, लेकिन पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने अड़ंगा लगा दिया। नरेंद्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय और नरोत्तम मिश्रा जैसे कद्दावर नेताओं को भी मंत्रिमंडल विस्तार में कम से संतोष करना पड़ा है।

सिंधिया को इसलिए अहमियत
सितंबर में भाजपा को विधानसभा उपचुनाव का सामना करना है। इनके नतीजे पर शिवराज सरकार का भविष्य तय होगा। यही वजह है कि भाजपा नेतृत्व ने किसी तरह का खतरा उठाने से परहेज बरतते हुए सिंधिया को वरीयता दी। हालांकि उसके सामने उपचुनाव के दौरान इससे जुड़ी सीटों पर पूर्व में चुनाव लड़े पार्टी नेताओं को साथ बनाए रखने की भी चुनौती होगी।
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शिवराज के लिए हैं संकेत

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