हिंदी दिवसः बड़ा हो रहा है हिंदी का बाजार?

Surendra Vermaसुरेन्द्र वर्मा Updated Sat, 14 Sep 2013 05:07 PM IST
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"हिंदी को छोड़कर तो मैं और कहीं नहीं जाऊंगी" ये किसी भारतीय लड़की के शब्द नहीं, यह कहना है रूस की ओल्गा का। हिंदी बोलने पर इनकी पकड़ इतनी अच्छी है जितनी कई भारतीयों की भी नहीं होगी।
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ओल्गा जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिंदी में एमए की द्वितीय वर्ष की छात्रा हैं। इससे पहले वो दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दू कॉलेज से हिंदी में स्नातक कर चुकी हैं।
भारत आने से पहले रूस में अपने विश्वविद्यालय में रामायण और महाभारत पढ़ने के बाद उन्होंने हिंदी और भारत में अपने भविष्य का सफर तय कर लिया था।
इसी विश्वविद्यालय में चीन की दो लड़कियां हिंदी में स्नातक कर रही हैं। दोनों को हिंदी से इतना लगाव हुआ कि उन्होंने अपना नाम ही हिंदी में रख लिया।

इनमें से एक रेखा कहती हैं, "मुझे लगता है कि चीन और भारत में संबंद्ध प्रगाढ़ होने वाले हैं इस लिए मुझे लगा की हिंदी सीखना मेरे लिए अच्छा होगा। इनकी साथी वर्षा कहती हैं, "मुझे बॉलीवुड बहुत पसंद हैं।" इन्होंने हिंदी के दो गाने भी सुनाए।

'काम के लिए हिंदी'
लेकिन भारत में हिंदी सीख रहा बड़ा विदेशी तबका ऐसा है जो उच्च शिक्षा या करियर के तौर पर हिंदी का चयन नहीं करता बल्कि अपने काम के लिए, कुछ समय के लिए हिंदी सीख रहा है।

भारत में लोगों को लगता है कि हिंदी का विस्तार रुका है लेकिन पूरे विश्व से आए आंकड़े बताते हैं कि हिंदी का विस्तार बढ़ा है। यह कहना है दिल्ली के मालवीय नगर में विदेशी छात्रों को हिंदी पढ़ाने वाले संस्थान 'हिंदी गुरु' के संथापक चंद्रभूषण का।

इस संस्थान में लगभग 32 देशों से विद्यार्थी हिंदी सीख रहे हैं। एक इमारत के तल में हिंदी के विस्तार के नए प्रयोग किए जा रहे हैं।

चंद्रभूषण बताते हैं, "जो लोग हिंदी सीखने आते हैं उनमें बहुत से लोग किसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं, कुछ मीडिया के लोग हैं जो भारत में फिल्में बनाना चाहते हैं, कुछ संगीतकार हैं जो हिंदी या संस्कृत के शब्द अपने गानों में डाल कर रीमिक्स करना चाहते हैं और कुछ अंतरराष्ट्रीय विमान सेवा के क्रू मेंबर हैं।"

उन्होंने बताया, "भारत में काम कर रहे विदेशी राजदूत और बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के विदेशी कर्मचारी और भारत में शोध कार्यों के लिए आने वाले लोग भी पहले हिंदी सीखने चाहते हैं।"

वह कहते हैं, "जब हमने शुरुआत की थी तब इतने लोग नहीं थे लेकिन पिछले पांच-छह सालों में यह संख्या बढ़ी है।"

इसी संस्थान में पढ़ने वाले एड्म जाधव जिन्होंने एक भारतीय लड़की से शादी की है। उनका कहना है, "ससुराल वालों से बात करने के लिए हिंदी सीखना बहुत ज़रूरी है।"

'बड़ा बाजार'

दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर सुधीश पचौरी कहते हैं, "काफी बड़ी तादाद में विदेशी विद्यार्थी हिंदी की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। हिंदी एक बड़ा बाजार बना हुआ है। हिंदी सीखने के लिए बाहर से लोग आना चाहते हैं। मुझे लगता है कि ब्लॉग ने और फेसबुक ने हिंदी का विस्तार किया है।"

चंद्रभूषण का कहना है, "हिंदी उन लोगों के लिए एक जुनून की तरह होती है। मैंने जापानी लोगों के बिजनेस कार्ड पर हिंदी में लिखा हुआ नाम देखा है।"

विदेशी विद्यार्थियों को हिंदी सिखाने में आने वाली समस्याओं के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा, "उनकी इच्छा यह होती है कि जल्दी से जल्दी लोगों से बात कर सकें और लोगों से घुल मिल सकें, उन्हें हिंदी सिखाते हुए मैं, मैंने और मुझे का अंतर स्पष्ट करना मुश्किल होता है। कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनके एक से अधिक अर्थ होते हैं, जैसे लगना, मुझे लगा या मुझे चोट लग गई, साथ ही स्त्री लिंग और पुल्लिंग का भेद भी समझाना मुश्किल हो जाता है।"

"जापानी लोग हिंदी सीखते हुए 'र' को हमेशा 'ल' बोलते हैं, और जर्मन लोग 'ज' को 'य' बोलते हैं।"

हिंदी सिखाने के लिए संकेत की भाषा का भी खूब प्रयोग होता है। कक्षा में अर्थ बताने के लिए अभिनय का सहारा लेना पड़ता है साथ ही ऑडियो- विजुअल माध्यम की भी सहायता ली जाती है। जिस देश के विद्यार्थी को समझाना है अगर उस देश की भाषा शिक्षक को आती हो तो अपनी बात आसानी से समझाई जा सकती है।

'वैश्वीकरण'

यह पूछने पर कि इतनी मुश्किलों के बाद भी वो लोग हिंदी सीखना क्यों चाहते हैं, चंद्रभूषण ने बताया, "वैश्वीकरण इसकी एक बड़ी वजह है। हिंदी जानने वाले लोगों को भारत में काम करने वाली कंपनियां वरीयता देती हैं। मैंने जापानी लोगों के बिजनेस कार्ड पर हिंदी में लिखा हुआ नाम देखा है।"

जो लोग भारत में काम करने के लिए आते हैं, उन्हें अक्सर प्राथमिक स्तर की हिंदी सीखने की जरूतर पड़ती है। जो लोग विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी सीख रहे होते हैं वो माध्यमिक स्तर की हिंदी सीखने के लिए भारत आते हैं।

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जी एस मीणा का कहना है, "हिंदी एक बड़ी भाषा के रूप में उभर रही है पूरी दुनिया में और भारत एक बड़े बाजार के रूप में, तो अगर एक बाजार में आपको स्थान बनाना है और इस बड़ी दुनिया को आपको समझना है तो निश्चित तौर पर आप भाषा के माध्यम से ही यह काम कर सकते हैं। पहले केवल विश्वविद्यालयों में हिंदी सिखाई जाती थी लेकिन आजकल बहुत से इंस्टीट्यूट भी बाजार में हैं। इनकी बड़ी भूमिका को भी हमें समझना चाहिए। वैश्वीकरण बिना भाषाई आदान-प्रदान के संभव ही नहीं है।"

प्रोफेसर मीणा कुछ महीनों बाद कोरिया के हंकूक विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाने जा रहे हैं।

'ऑनलाइन पाठ्यक्रम'


सुधीश पचौरी ने बताया, "भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों से ऐसे भी लोग आते हैं जो वहां हिंदी में पीएचडी कर रहे होते हैं। वो केवल अपने व्यवहारिक ज्ञान के लिए हिंदी जानने भारत आते हैं या फिर हिंदी में अध्यन के अन्य स्रोत ढूंढते हुए भारत आ जाते हैं।"

उन्होंने बताया, "दिल्ली विश्वविद्यालय में ऐसे बहुत से लोग आते हैं जो "इंडोलॉजी" यानि भारत के बारे में अध्यन में रूचि रखते हैं। वो भारत के समाज, संस्कृति, धर्म के बारे में जानना चाहते हैं। उनके लिए हिंदी सीखना इसी प्रक्रिया का एक हिस्सा होता होता है।

उनका रुझान यह है कि वो फिल्मों के जरिए हिंदी सीखना चाहते हैं। बाजार में निकल कर लोगों से मिलना चाहते हैं।

सुधीश पचौरी कहते हैं, "वो शुद्ध हिंदी की तरफ जाते हैं, जबकि हम लोग काम की हिंदी या बातचीत की हिंदी की ओर बढ़ते हैं। हमारी दिक्कत ये है कि हमने कभी इनको अपना सही ग्राहक नहीं माना। कायदे से हिंदी पढ़ाने के लिए ऑनलाइन पाठ्यक्रम विकसित करने चाहिए ताकि हम उन्हें घर बैठे या बहुत ही कम खर्चे में हिंदी सिखा सकें। अभी इस तरफ हमारा कोई सुनियोजित प्रयास नहीं हुआ है।"

रूस से हिंदी पढने भारत आईं ओल्गा कहती हैं, "विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए मुझे ये पता चला कि भारत में हिंदी की स्तिथि अच्छी नहीं है। यहां लोग अंग्रेजी पर ज्यादा ध्यान देते हैं। हिंदी एक ऐसी भाषा है जो लोगों को जोड़ती है इसलिए हिंदी पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।"
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