इस उछाल का कोई आधार नहीं

नई दिल्ली Updated Fri, 01 Nov 2013 09:19 PM IST
विज्ञापन
amar ujala editorial

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹249 + Free Coupon worth ₹200

ख़बर सुनें
ठीक दिवाली से पहले शेयर बाजार में आई भारी तेजी से अचानक खुशी और उम्मीद का माहौल बन गया है। लेकिन यह तेजी सिर्फ शेयर बाजार में ही नहीं है, सितंबर में आठ बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर भी करीब आठ फीसदी दर्ज की गई है। यानी औद्योगिक उत्पादन के क्षेत्र में भी संभावनाएं दिखने लगी हैं। लेकिन क्या ये आंकड़े देश की अर्थव्यवस्था के प्रति वाकई कोई उम्मीद जगाते हैं?
विज्ञापन

अमूमन चढ़ते शेयर बाजार को अर्थव्यवस्था की सुधरती सेहत का सुबूत समझ लिया जाता है। जबकि फिलहाल ऐसा है नहीं। सेंसेक्स और निफ्टी में आई यह तेजी वस्तुतः अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा उस आर्थिक नीति को बरकरार रखने का नतीजा है, जिसने विदेशी संस्थागत निवेशकों को हमारे शेयर बाजार में निवेश करने का भरोसा दिया है। अगर डॉलर इसी तरह आता रहा, तो रुपया भी एक हद तक सुधर सकता है।
चूंकि रबी की फसल अच्छी हुई है, लिहाजा दिवाली में खर्च करने के लिए किसान के हाथ में पैसा भी है। इन सबके बावजूद अर्थव्यवस्था के प्रति स्थायी उम्मीद की कोई वजह इसलिए नहीं है, क्योंकि वैश्विक स्थिति डावांडोल होने पर शेयर बाजार को जमीन पर आते देर नहीं लगेगी। ऊंची मुद्रास्फीति को खुद रिजर्व बैंक एक बड़ी चुनौती बता चुका है। ऐसे में, डीजल के बढ़े हुए दाम से खाद्यान्न और दूसरी जरूरी चीजों की कीमत और ऊपर ही जाएगी। ब्याज दरों में मामूली बढ़ोतरी से महंगाई पर अंकुश लगने की कोई गारंटी नहीं है, उल्टे मध्यवर्ग और उद्योग जगत के माथे पर थोड़ी शिकन जरूर आ गई है।
कुछ बैंकों की बढ़ती गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां भी अर्थव्यवस्था के लिए बुरी खबर है। इन सबके बीच मौजूदा वित्त वर्ष के शुरुआती छह महीनों में राजकोषीय घाटा और राजस्व घाटा अनुमान से कहीं अधिक रहा है, जिससे आर्थिक विकास दर मौजूदा आकलन से भी नीचे जा सकती है। केंद्रीय बैंक का कहना है कि रुकी पड़ी परियोजनाओं को शुरू कर सरकार को चाहिए कि वह अर्थव्यवस्था को गति दे।

लेकिन इस चुनावी मौसम में सरकार वोट की चिंता करेगी या देश की आर्थिक सेहत सुधारने की कोशिश में लगेगी? फिर इस चुनावी अनिश्चय के माहौल का भी बाजार पर असर पड़ेगा। लिहाजा दिवाली की इस गहमागहमी में भले ही दो-चार दिन खरीदारी और मौज-मस्ती में निकल जाएं, लेकिन अभी ऐसी स्थिति बनी नहीं है, जिससे अर्थव्यवस्था से कोई स्थायी भरोसा बने।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
  • Downloads

Follow Us