दिमाग में नहीं दिल में है चेतना

डॉ. प्रणव पंड्या Updated Fri, 06 Apr 2018 03:30 PM IST
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mind is the consciousness in the heart

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काया को यदि कायदे से समझें तो अपने चेतन, अचेतन और सुपर चेतन का इस्तेमाल कर चमत्कार किए जा  सकते हैं। परामनोविज्ञान, मेटाफिजिक्स आदि माध्यमों से पिछले दिनों मनः संस्थान की अचेतन परतों की महत्ता बखान की जाती रही है। उसे जगाने उभारने के लिए तरह-तरह के प्रयोग भी हुए। तथ्यों से पता चला कि अचेतन से भी असंख्य गुनी संभावनाएं ‘सुपर चेतन’में है।
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‘साइकोलॉजी ऑफ इंट्यूशन’ नामक अपनी कृति में मन: शास्त्री एमिली मारकाल्ट ने अंतःकरण की चर्चा के दौरान कहा है कि चेतना का केंद्र मस्तिष्क नहीं, अंतःकरण है। अब तक प्रकृति को खोजा, पाया और दोहन किया गया, परंतु अब परमात्मा की खोज और उसके पाने की बारी है। ऐसा संपर्क साधने के लिए एक ही स्थान मानवी अंतःकरण है। सहायता इसी केंद्र में बसती है। हेनरी गाल्डर ने अपने ग्रंथ 'एवोल्यूशन एंड मैन्स प्लेस इन नेचर' में इसी केंद्र की विशालता को और अधिक गहरा बनाने पर जोर दिया है। वस्तुओं का लाभ जिसे उठाना है, उसकी अंतः चेतना यदि निकृष्ट रही, तो संपदा का दुरुपयोग ही होगा। संपदा कितनी ही क्यों न बढ़े, पर उपभोक्ता की गरिमा ही उनके अच्छे नतीजे दे सकती है।
मनुष्य की स्थिति और संभावनाओं का केंद्र उसके दिमाग को नहीं अंतःकरण को समझना चाहिए। यहीं से मनः संस्थान को निर्देश मिलता है और वह एक अच्छे सेवक की तरह वैसा ही सोचना शुरू कर देता है, जिससे कि आकांक्षा की पूर्ति संभव हो सके। मन की सोचने की दिशा धारा वहीं से मिलने वाले संकेतों पर निर्भर है।अंतः करण का आदेश मन मानता है और मन के इशारे पर चलने वाला शरीर स्वामी भक्त सेवक की भूमिका निभाने लगता है। इसमें उसे भला-बुरा सोचने या किसी प्रकार नानुकर करने की भी इच्छा नहीं होती। मनोविज्ञान जिसे ‘सुपर चेतन’ कहता है। अध्यात्म इसी अंतराल को जीवात्मा का निवास कहता है।
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