शिक्षक दिवस 2018: भौतिकता से परे होता है गुरु और शिष्य का रिश्ता

सद्गुरु, ईशा फाउंडेशन Updated Wed, 05 Sep 2018 01:18 PM IST
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Teachers Day 2018 tradition of teacher and student medium of communication of yoga

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गुरु और शिष्य का रिश्ता हर भौतिकता से परे होता है। यह रिश्ता इस संस्कृति में सबसे पवित्र और शाश्वत माना गया है। गुरु कोई शिक्षक नहीं होता। गुरु-शिष्य संबंधों का आधार एक उर्जा होती है। वह एक ऐसे आयाम या धरातल पर स्पर्श करता है, जहां कोई दूसरा स्पर्श नहीं कर सकता।
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आजकल आप योग प्रशिक्षण कहीं भी ले सकते है - टेलीविजन, इंटरनेट से लेकर पुस्तकों तक से। इनमें हर तरह के योग सिखाए जा रहे हैं: कूल योग, हॉट योग, पावर योग इत्यादि। इसके लिए किसी खास संयम या साधना की जरूरत नहीं है, आप बस कुछ सीडी देखकर या कुछ पुस्तकें पढक़र इसमें पारंगत हो सकते हैं। योग अब रूपांतरण का नहीं, बल्कि मनोरंजन का साधन बन गया है। और इसका परिणाम देखा जा सकता है।
कुछ समय पहले पश्चिम के समाचार पत्रों में यह खबर बहुत तेजी से फैली की योग इंसान के लिए बहुत खतरनाक है और इस पर रोक लगनी चाहिए। भारत जैसी एक सुसमृद्ध संस्कृति में, जो योग विज्ञान का जनक रहा है, यह बहुत ही शर्म और आपमान की बात है। योग की गूढ़ता और बारीकियों को समझे बिना अगर इसका अभ्यास किया गया तो यह निश्चित रूप से खतनाक साबित हो सकता है। एक खास तरह की जागरूकता में विधिवत करने से जो विद्या मानवीय चेतना के खिलने का माध्यम बन सकती है, वही अनजाने में उसकी विकृति का कारण भी बन सकती है।
विशुद्ध परंपरागत योग अपने आप में एक जबरदस्त शक्तिशाली विज्ञान है। जीवन के उच्चतर आयाम तक पहुंचने के मकसद से योग की पूरी प्रक्रिया को बेहद साावधानी बरतते हुए विधिपूर्वक तैयार किया गया है।भारत में हजारों साल से गुरु शिष्य परंपरा फलती फूलती रही है। इस संस्कृति में जहां सूक्ष्म व शक्तिशाली ज्ञान को आगे बढ़ाने की जरूरत थी, वहां इस काम को एक आपसी विश्वास, पूरी निष्ठा और गुरु व शिष्य के बीच गहरी आत्मीयता के माहौल के बीच किया गया।

दुनियाभर में भारत ही अकेला ऐसा देश है, जहां इस तरह की परंपरा मौजूद है। यह परंपरा है कि अगर किसी व्यक्ति को कुछ अनुभूति होती है तो वह उसके बाद किसी ऐसे व्यक्ति को तलाशता है, जो न सिर्फ पूरी तरह से समर्पित हो, बल्कि इस अनुभूत सत्य को अपने जीवन से बढक़र संभाल सके। फिर वह व्यक्ति अपनी अनुभूति और ज्ञान दूसरे व्यक्ति को सौंप देता है। अब यह व्यक्ति इसी तरह के किसी तीसरे व्यक्ति या पात्र को तलाशता है और अपना ज्ञान उस तीसरे को सौंप देता है। यह सिलसिला पिछले हजारों सालों से बिना एक बार भी रुके या टूटे ऐसे ही चलता आया है। यही सिलसिला गुरु-शिष्य परंपरा के नाम से जाना जाता है।

हालांकि हमारे पूर्वज लिखना जानते थे, लेकिन इसके बाद भी उन्होंने जीवन के आध्यात्मिक पक्ष के बारे में कभी नहीं लिखा। दरअसल, वे जानते थे कि अगर एक बार इन्हें लिख दिया गया तो गलत किस्म के लोग इसे पढक़र इसका गलत मतलब निकालेंगे और गलत व्याख्या करेंगे। उनका मानना था कि एक खास स्तर तक अनुभव पाया हुआ व्यक्ति ही इस ज्ञान को जाने, जबकि दूसरे लोग इसे न जानने पाएं। इस तरह से परंपरा स्वरूप ज्ञान एक से दूसरे तक पहुंचता गया। जब गुरु-शिष्य परंपरा टूटने लगी, केवल तभी आध्यात्मिक सत्य व तथ्य को लिखा जाने लगा। उससे पहले कभी इसके बारे में नहीं लिखा गया। एक बार अगर आपने लिख दिया तो सबसे पहले इन किताबों को विद्वान लोग पढ़ेंगे। एक बार अगर ये किताबें विद्वानों के हाथों लग गईं तो समझिए यह खत्म हो गईं। इनमें प्रकाशित सत्य खत्म हो जाएगा।

योग विज्ञान का मकसद किसी इंसान को उसकी पांचों ज्ञानेंद्रियों जनित अनुभवों से परे ले जाकर उसे अपनी परम प्रकृति को समझने में मदद करना है। ऐसा करने के लिए इंसान के पास आवश्यक उर्जा का सहयोग होना जरूरी है। जो चीज आपके अनुभव में नही है, उसे आपको बौद्धिक रूप से नहीं समझाया जा सकता। यह आपको अनुभव के एक अलग आयाम में ले जाकर ही समझाई जा सकती है। किसी व्यक्ति को अनुभव के एक आयाम से दूसरे आयाम तक ले जाने के लिए आपकी मौजूदा अवस्था से ज्यादा प्रबलता व उर्जा वाले किसी उपकरण या माध्यम की जरूरत होती है। यह माध्यम या उपकरण ही गुरु कहलाता है।

गुरु कोई शिक्षक नहीं होता। गुरु-शिष्य संबंधों का आधार एक उर्जा होती है। वह एक ऐसे आयाम या धरातल पर आपको स्पर्श करता है, जहां कोई दूसरा स्पर्श कर ही नहीं सकता। यह ऐसी जगह है, जहां कोई और दूसरा- मसलन आपका पति, पत्नी, आपका बच्चा, आपके माता-पिता कोई नहीं स्पर्श कर सकते। वे लोग केवल आपकी भावनाओं, आपके दिमाग और आपके शरीर का स्पर्श कर सकते हैं। अगर आप अपनी चेतना के चरमबिंदु पर पहुचंना चाहते हैं तो आपको बहुत ज्यादा उर्जा की जरूरत होती है। जितनी उर्जा आप में है, उससे कहीं ज्यादा। गुरु शिष्य का रिश्ता बेहद पावन और महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि शिष्य की प्रगति में जब कोई समस्या आती है तो उसे उर्जा क्षेत्र में जरा से धक्के या सहारे की जरूरत होती है। बिना उस धक्के के शिष्य के पास इतनी उर्जा शक्ति नहीं होती कि वह चरम बिंदु पर पहुंच सके। यह धक्का केवल वही व्यक्ति आपको दे सकता है, जो आपसे उच्च धरातल पर हो। उसके अलावा कोई और यह काम नहीं कर सकता। ऊर्जा के इस पहलू को ध्यान में रखते हुए हमने ईशा में गुरु शिष्य परंपरा की शुरूआत की है और साथ ही ईशा योग केंद्र में कई शक्तिशाली ऊर्जा केंद्रों की स्थापना की गई है।
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