रियासत में मिली सियासत किसी ने बचाई तो किसी ने गंवाई

अमर उजाला ब्यूरो इलाहाबाद Updated Wed, 18 Jan 2017 01:11 AM IST
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 रियासत और सियासत की जुगलबंदी पुरानी है। एक दौर था, जब इलाहाबाद और प्रतापगढ़ के रजवाड़ों ने देश को प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री और राज्यपाल तक दिए। धीमे-धीमे माहौल बदला और राजघरानों की राष्ट्रीय स्तर की राजनीति यूपी में ही सिमट कर रह गई। कुछ रियासतों की सियासत अब ब्लॉक और जिला पंचायत स्तर तक होती है तो किसी ने सियासत से पल्ला ही झाड़ लिया।
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मांडा राजघराना: पिता बने पीएम, बेटा व्यापारी
 मांडा खास ब्लॉक मुख्यालय से 300 मीटर की दूरी पर बना भव्य राजमहल, जहां से कभी देश की राजनीति की दिशा तय होती थी। इसी राजघराने ने वीपी सिंह के रूप में देश को एक प्रधानमंत्री दिया। एक दौर था जब चुनाव की घोषणा होते ही राजमहल में उत्सव सा माहौल नजर आता था, मगर अब वहां सन्नाटा छाया रहता है। वीपी सिंह के निधन के बाद उनके बड़े पुत्र अभय प्रताप सिंह ने विरासत में मिली सियासत को आगे बढ़ाना चाहा लेकिन सफलता नहीं मिली। उन्होंने राजनीति छोड़ व्यवसाय अपना लिया। अभय प्रताप सिंह कभी-कभार यहां आते हैं लेकिन राजनीति से दूर ही रहते हैं। कुछ कर्मचारी ही अब राजमहल की देखरेख करते हैं।
कालाकांकर: बेटी ने संभाली पिता की विरासत
आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाने वाले कालाकांकर राजघराने का राजनीति से गहरा रिश्ता है। इस राजघराने को कांग्रेस का गढ़ भी कहा जाता है। इस स्टेट के राजा रामपाल सिंह कांग्रेस के संस्थापक सदस्य रहे। राजा दिनेश सिंह वर्ष 1971 के लोकसभा चुनाव में सांसद चुने गए। कुंडा क्षेत्र उस समय रायबरेली क्षेत्र से जुड़ा था। राजा दिनेश सिंह को पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का करीबी माना जाता था। इंदिरा गांधी का करीबी होने के नाते उन्हें केंद्रीय मंत्रीमंडल में भी जगह मिली। विदेश मंत्री, वाणिज्य उद्योग, मानव संसाधन विकास मंत्री समेत कई महत्वपूर्ण पदों पर उन्होंने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई। उनके निधन के बाद सबसे छोटी पुत्री राजकुमार रत्ना सिंह ने पिता की विरासत संभाली। वह 11वीं, 13वीं एवं 15वीं लोकसभा की सदस्य चुनी गईं। इलेक्शन वाच नामक संस्था की रिपोर्ट की मानें तो वह सबसे धनी महिला सांसद भी बताई गई थीं। मौजूदा समय में वह कांग्र्ेस की राजनीति में सक्रिय हैं।

प्रतापगढ़ सिटी: सियासी जमीन बचाने की जद्दोजहद
वर्ष 1962 में प्रतापगढ़ किले के राजा अजीत प्रताप सिंह जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़कर लोकसभा पहुंचे। वह तीन बार कांग्रेस से विधायक व वन मंत्री भी रहे। उनके बाद सियासत में उनके पुत्र राजा अभय प्रताप सिंह ने कदम रखा। वह जनता दल से चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंचे। प्रदेश की सियासत के साथ राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में भी प्रतापगढ़ किला का दबदबा दिखता रहा। पिता की विरासत संभालने वाले राजा अनिल प्रताप सिंह कई बार विधानसभा का चुनाव लड़े लेकिन कामयाबी नहीं मिली। कांग्रेस के टिकट पर वर्ष 2012 में विश्वनाथगंज विधानसभा से चुनाव लड़े। मौजूदा समय में राजा अनिल प्रताप सिंह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो चुके हैं।

भदरी राजघराना: विरासत में मिली सियासत को दी मजबूती
भदरी राजघराने का नाम सुनते ही प्रदेश व देश में लोगों के सामने राजाभैया का नाम सामने आ जाता है। इस रियासत के राजा राय बजरंग बहादुर सिंह हिमाचल प्रदेश के गर्वनर बने थे। इसके अलावा वह अवध फ्लाइंग क्लब के संस्थापक रहे। बाद में उस क्लब पर अमौसी एयरपोर्ट बना। बाबा की सियासत को मजबूती से आगे बढ़ाते रघुराज प्रताप सिंह राजभैया 1993 में पहली बाद विधानसभा चुनाव लड़े और बतौर निर्दल प्रत्याशी जीत हासिल की। इसके बाद वह विधानसभा का हर चुनाव जीतते चले गए। प्रदेश की भाजपा व सपा सरकार में वह कैबिनेट मंत्री के रूप में कार्य कर चुके हैं। मौजूदा समय में भी वह प्रदेश सरकार में मंत्री हैं। वह इस बार भी कुंडा विधानसभा से निर्दल ही चुनाव लड़ेंगे। जिले की सियायत में राजाभैया का खासा दखल है।

दिलीपपुर राजघराना: ब्लॉक, गांव की राजनीति में रह गए सीमित
 जनपद के पूर्वी छोर पर स्थित दिलीपपुर राजघराना में जहां संपत्ति को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ रहा है, वहीं इस किले की सियासत केवल ब्लॉक प्रमुख, बीडीसी एवं प्रधान तक ही सिमट कर रह गई है। कभी राजा अमरपाल सिंह विधान परिषद सदस्य बने थे। उनके बाद सियासत से परिवार के लोग दूर रहे। तीन बार राजा सूरज सिंह व रानी सुषमा सिंह दिलीपपुर की प्रधान रहीं। दिलीपपुर राजघराने की राजकुमारी भावना सिंह विरासत में मिली सियासत को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं लेकिन पारिवारिक हालात को देखते हुए समय का इंतजार कर रही हैं।
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