किसी ने सिलिंडर बेचा तो किसी ने बर्तन और चूल्हा...फिर निकल पड़े अपनी राह

नवनीत अग्रवाल, गजरौला Updated Sun, 10 May 2020 02:23 PM IST
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अपनी-अपनी साइकिलों के साथ श्रमिक
अपनी-अपनी साइकिलों के साथ श्रमिक - फोटो : अमर उजाला

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किसी ने सिलिंडर बेचा तो किसी ने बर्तन और चूल्हा। कोई बिस्तर बेच आया तो किसी ने टीवी, रेडियो, जूते और जरूरत का अन्य सामान बेच डाला। पेट की भूख को मात देकर किसी तरह रकम जुटाई। पांच-पांच हजार रुपये में साइकिलें खरीद डालीं। इसके बाद दिल्ली, पंजाब, अंबाला, गुरुग्राम से निकल पड़े पूर्वांचल, बिहार और मध्यप्रदेश की ओर। 
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ब्रजघाट पहुंचे तो वहां पुलिस-प्रशासन ने रोक लिया। कहा कि बसों की व्यवस्था कराएंगे, लेकिन बसों की छत पर कैरियर न होने के कारण उन्हें अपनी साइकिलें तीन-तीन सौ रुपये में बेचने को विवश होना पड़ा। कई ऐसे भी रहे जो कि साइकिलों की वजह से बस में बैठने को तैयार ही नहीं हुए और अपने सफर पर निकल पड़े।
शनिवार को डीपीएस में मौजूद दिल्ली, गाजियाबाद और पंजाब से बिहार जा रहे असलम, मनोज झा, शिखन्यू, चंदन, विकास यादव, ब्रजेश कुमार, ललांक प्रसाद, अफजल, बच्चा बाबू, गोपाल, आरिफ ने बताया कि उन्होंने पांच-पांच हजार रुपये में साइकिलें खरीदी थीं। अधिकारी कह रहे हैं कि साइकिलें बस में नहीं जा सकती हैं। खून-पसीने की कमाई से इन्हें खरीदकर यहां कैसे छोड़कर सकते हैं। इसलिए इन्हीं पर बैठकर अपना सफर तय करेंगे। इन्होंने बताया कि उनके कई साथियों ने ब्रजघाट में रोके जाने पर तीन-तीन सौ रुपये में अपनी साइकिलें बेच दीं।
डीपीएस में कराई ठहरने की व्यवस्था
दिल्ली, पंजाब, हरियाणा आदि राज्यों एवं बाहरी शहरों से लौट रहे श्रमिकों को घर भिजवाने से पूर्व उनके ठहरने, भोजन एवं थर्मल स्क्रीनिंग की व्यवस्था हाईवे पर स्थित डीपीएस में कराई गई। हालांकि पूर्व में इंदिरा चौक स्थित रमाबाई आंबेडकर राजकीय महाविद्यालय में आश्रय स्थल बनाया गया था, लेकिन अचानक से प्रशासन ने शनिवार को उसे बंद कराकर डीपीएस में आश्रय स्थल बनवा दिया। मंडी धनौरा की दिशा से पैदल आ रहे अंबाला के कई श्रमिकों को इंदिरा चौक पर ही पुलिसकर्मियों ने रोक लिया और उन्हें दिल्ली की दिशा में जा रहे वाहनों में बैठाकर वहां भेजने की व्यवस्था कराई। वहीं इन श्रमिकों के भोजन, चाय एवं थर्मल स्क्रीनिंग की व्यवस्था की गई थी।

डीपीएस में ही छोड़कर चले गए साइकिलें
डीपीएस में मौजूद करनाल से मोतीहारी जा रहे श्रीकांत ने बताया, उसने अपने बर्तन और बिस्तर आदि बेचकर 4800 रुपये में साइकिल खरीदी थी, लेकिन अब उसे यहीं छोड़कर जाना मजबूरी है। जनपद बस्ती निवासी सुनील शर्मा और विशाल दिल्ली में रहकर पढ़ाई करते थे। इन दोनों ने भी अपनी साइकिलें यहीं छोड़ दीं। इनके अलावा कई ऐसे श्रमिक थे जिन्हें रोडवेज बस के चालकों ने साइकिल की वजह से बैठाने से इनकार कर दिया। मजबूरन वे अपनी-अपनी साइकिलें यहीं छोड़कर चले गए। 

गजरौला में कुछ रोडवेज बसों के स्टाफ द्वारा श्रमिकों की साइकिलें ले जाने से इनकार करने की शिकायतें मिली हैं। तर्क दिया जा रहा है कि इन बसों की छत पर कैरियर नहीं हैं। ऐसे में यदि हादसा हो गया तो कौन जिम्मेदार होगा। इसलिए कोशिश की जा रही है कि वहां कैरियर वाली ही बसें भिजवाईं जाएं। श्रमिकों द्वारा छोड़ी गईं साइकिलों की सुरक्षा की जिम्मेदारी पालिका की होगी। 
उमेश मिश्र, डीएम, अमरोहा

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