20 वर्ष पहले का जख्म हो गया हरा, तब रेलवे पुलिस ने फौजी के छोटे भाई को मारी थी गोली

Varanasi Bureauवाराणसी ब्यूरो Updated Mon, 03 Aug 2020 10:39 PM IST
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गाजीपुर। नूरपुर के पीड़ित ब्राह्मण परिवार पर खाकी का कहर पहली बार नहीं टूटा। 20 वर्ष पहले भी फौजी परिवार के एक युवक की रेलवे सुरक्षा बल के कर्मी ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस गहरे जख्म को परिवार के लोग अपने सीने में दफन कर चुके थे लेकिन इसे पुन: नगसर पुलिस की क्रूरता ने हरा कर दिया है। तब आरपीएफ (रेल सुरक्षा बल) का जवान ट्रेन से सामान उतारने को लेकर छोटे भाई से उलझ गया था और कहासुनी के बीच उसे गोली मार दी थी। इसके बाद उसकी मौके पर ही मौत हो गई थी। दो दिन की छुट्टी पर आए फौजी अजय पांडेय पर आगजनी, तोड़फोड़ और कर्मचारियों से मारपीट के मामले में मुकदमा दर्ज कर लिया था। इस मामले में सेना द्वारा रेलवे अधिकारियों को लिखा-पढ़ी भी की गई थी। तब से आज तक न कोई नोटिस आया और न ही जेल गए। जांच भी हुई और घटना के चार वर्ष बाद रेलवे ने मुआवजा भी दिया था। ऐसे में पीड़ित परिवार का पुलिसिया उत्पीड़न ईमानदारी एवं सच्चाई का साथ देने को लेकर होता रहा है। इनका आपराधिक इतिहास ग्रामीणों के समझ से परे है। अपने छोटे भाई को खोने के बाद अजय पांडेय ने बताया कि वह और उनके दो भाई कमल एवं सुशील कारगिल युद्ध के दौरान राजस्थान से सटे भारत-पाक सीमा पर अलग-अलग सेक्टर में तैनात थे। छोटे भाई अरुण पांडेय की दिलदारनगर में कपड़े की दुुकान थी। वर्ष 2000 में वह दो दिन की छुट्टी लेकर घर आए हुए थे। इधर छोटा भाई अरुण बिहार स्थित ससुराल से अपनी पत्नी को विदा कराकर ट्रेन से आ रहा था। दिलदारनगर रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से सामान उतारते समय किसी बात को लेकर आरपीएफ जवान से कहासुनी हो गई थी। जवान ने अरुण को गोली मार दी, भाई की मौके पर ही मौत हो गई थी। इधर, घटना से आक्रोशित हजारों लोग स्टेशन पहुंच गए थे, जबकि अजय पांडेय पोस्टमार्टम के बाद देर रात छोटे भाई का अंतिम संस्कार कर रहे थे। घटना से दुखी लोगों ने ट्रेन की एक बोगी को आग के हवाले कर दिया था और स्टेशन परिसर में तोड़फोड़ की थी। उन्होंने बताया कि दो दिन की छुट्टी के बाद जब वह ड्यूटी पर पहुंचे तो घर से सूचना आई कि रेलवे की ओर से उनके खिलाफ नोटिस भेजा गया है। इस मामले में सेना ने रेलवे के अधिकारियों को पत्र भेजकर सैनिक को फर्जी न फंसाने की बात कही थी। इसके बाद जांच हुई लेकिन नोटिस नहीं मिला। यही नहीं, घटना के चार वर्ष बाद मृतक अरुण के परिवार को रेलवे द्वारा पांच लाख का मुआवजा भी दिया गया था। कई वर्ष बीत जाने के बाद भी आज तक न तो नोटिस आया और न ही जेल गए। नूरपुर घटना के बाद एकाएक स्थानीय पुलिस द्वारा आपराधिक इतिहास जारी कर देना परिवार वालों के लिए समझ से परे हो चुका है।
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