लाखों के नुकसान पर मादक पदार्थों से वारे-न्यारे

ब्यूरो/ अमर उजाला, मेरठ Updated Sat, 12 Mar 2016 05:49 PM IST
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भांग की  दुकान।
भांग की दुकान। - फोटो : अमर उजाला

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भांग का ठेका ऐसा ठेका है, जहां नुकसान ‘हाथी के दांत’ की तरह है, जो बाहर से दिखाई देता है। जबकि अंदर तो फायदा ही फायदा है। इस ठेके को पाने के लिए खूब मारामारी होती है। हापुड़ स्टैंड ही नहीं, शहर के आधा दर्जन भांग के ठेके जितने रुपयों में नीलाम हुए हैं, वह उनकी एक नंबर की कमाई से तीन गुना ज्यादा हैं। हापुड़ स्टैंड के ठेके पर ही बिकने वाली भांग का गणित देखा जाए, तो 56 लाख रुपये का नुकसान नजर आता है।
 
शहर में 11 और देहात के तीन कसबों में भांग के ठेके चल रहे हैं। बृहस्पतिवार को वर्ष 2016-17 के लिए ये नीलाम हुए। इनकी बोलियां आसमान को छू गईं। पिछले पांच साल से यही हाल है।

इन ठेकों पर सवाल 
यूं तो सभी ठेके बढ़ी दरों पर उठे, लेकिन जिन ठेकों पर शक की नजर उठी, उनमें भूमिया का पुल, सदर कैंट, हापुड़ स्टैंड, जेल चुंगी और टीपीनगर शामिल है। इनकी बोलियों में खूब खींचतान हुई। 

56.31 लाख के घाटे में क्यों लिया ठेका 
हापुड़ स्टैंड का ठेका 67,63,200 रुपये में छोड़ा गया। इसके बाद ठेकेदार को आबकारी विभाग के गोदाम से भांग खरीदनी होगी। तय कोटे की मात्रा में खरीदने पर ठेकेदार 12 रुपये प्रतिकिग्रा की दर से भुगतान करेगा। न्यूनतम कोटा 660 किग्रा का है।

यहां इतनी ही भांग पूरे साल में बिकती है। ऐसे में ठेकेदार मात्र 7,920 रुपये की भांग खरीदता है। 660 किग्रा भांग की पत्तियों को पानी में उबालने के बाद करीब 1900 किग्रा भांग के गोले तैयार होते हैं। कुल लागत 6,77,120 रुपये हो जाती है। एक गोला 25 ग्राम का होता है, जिसकी कीमत 15 रुपये होती है। ठेका संचालक पूरे साले में 76,000 भांग के गोले तैयार कर बेचता है।

जिससे उसे 11,40,000 रुपये की कमाई होती है। मतलब 56,31,120 रुपये का घाटा होता है। यह गणित अन्य ठेकों पर भी लागू होता है। भूमिया पुल ठेके का जो गणित बैठता है, उसमें 26,13,520 रुपये का घाटा है। सदर कैंट ठेके को 26,12,808 रुपये, जेल चुंगी ठेके को 22,58,056 रुपये और टीपीनगर ठेके को 27,86,720 रुपये का घाटा साफ नजर आता है। 

ऐसे होता है घाटा पूरा 
भांग के ठेके की आड़ में नशे का कारोबार फलफूल रहा है। इसे लेकर समाचार पत्रों में कई बार स्टिंग प्रकाशित हो चुके हैं। अमर उजाला तो लगातार इसके खिलाफ अभियान छेड़ चुका है। लेकिन सेटिंग के इस खेल में ठेकेदार चरस, अफीम, गांजा आदि मादक पदार्थ महंगी कीमतों पर बेचकर अपना घाटा पाटते हैं और फिर मोटी कमाई करते हैं। यह सारा खेल अधिकारियों की नजर में भी है। 

पुलिस का खुला संरक्षण 
भांग के ठेकों की आड़ में चल रहे नशे के इस कारोबार को पुलिस का खुला संरक्षण होता है। भांग के पुराने ठेकेदार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि संबंधित थाना, चौकी और फैंटम महीना नहीं, बल्कि ठेके से साप्ताहिक उगाही करते हैं। 

बहुत समस्याएं हैं वो उठाओ 
जिला आबकारी अधिकारी प्रदीप दूबे से जब भांग की बिक्री का आंकड़ा जाना गया, तो उन्होंने उल्टे रिपोर्टर को नसीहत दे डाली कि शहर में और भी बहुत समस्याएं और मुद्दे हैं। उन्हें उठाओ और छापो। प्रतिबंधित नशीले पदार्थों की बिक्री पर उन्होंने कहा कि पुलिस छापा डाल चुकी है। लेकिन भांग की दुकानों से कुछ नहीं मिला। लेकिन प्रदीप दूबे ने आंकड़ा उपलब्ध नहीं कराया। हालांकि रिपोर्टर ने विभागीय सूत्रों से आंकड़ा प्राप्त किया, तो स्पष्ट हो गया कि भांग के ठेकेदार तय कोटा ही उठाते हैं। इससे ज्यादा की खपत कभी नहीं हुई है। 

आबकारी और पुलिस विभाग नशे के इस अवैध कारोबार को बढ़ावा दे रहा है। मैंने आरटीआई में इसकी पूरी जानकारी मांगी है। इसके बाद इस पूरे खेल को शासन के समक्ष रखते हुए जनहित याचिका भी दायर की जायेगी। - संदीप पहल, अध्यक्ष सच संस्था
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