एक था ‘राजा’, एक थी स्वेतलाना

प्रतापगढ़ ब्यूरो Updated Wed, 14 Feb 2018 12:36 AM IST
विज्ञापन
प्रेम और यथार्थ
प्रेम और यथार्थ

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹249 + Free Coupon worth ₹200

ख़बर सुनें
कालाकांकर राजभवन की काली कोठी (प्रकाश गृह) की दीवारें उदास सी हैं। अंदर अजीब सी खामोशी है। राजघराने की इसी कोठी में कभी सोवियत संघ के तानाशाह शासक जोसेफ स्टालिन की ‘छोटी तितली’ की खिलखिलाहट भी गूंजी थी। इंग्लिश, फ्रेंच, रसियन और टूटी-फूटी हिंदी में मोहब्बत की दास्तां बयां हुई। प्रेम की वो परिभाषा लिखी गई जिसे सदियों तक भुलाया नहीं जा सकेगा। कालाकांकर राजघराने के कुंवर ब्रजेश सिंह और स्टालिन की बेटी स्वेतलाना अलिलुयेवा की प्रेम कहानी यहीं हमेशा के लिए अमर हो गई। सोवियत सरकार ने दोनों को शादी की इजाजत नहीं दी, लेकिन स्वेतलाना को बृजेश सिंह से इस कदर मोहब्बत थी कि तीन साल तक साथ रहने के बाद जब उनकी मौत हुई तो वह उनकी अस्थियां हिदूं रीति-रिवाज से गंगा में विसर्जित करने के लिए कालाकांकर आ गईं।
विज्ञापन

कालाकांकर राजघराने के कुंवर ब्रजेश सिंह उन कम्युनिस्ट नेताओं में से थे जिन्होंने 1930 के बाद सोवियत संघ के मास्को को अपना घर बनाया। वह पूर्व विदेश मंत्री स्व. राजा दिनेश सिंह के चाचा थे। 1963 में मास्को के एक अस्पताल में ब्रजेश सिंह और स्वेतलाना की मुलाकात हुई। ब्रजेश सिंह उस समय ब्रोन्किइक्टेसिस जैसी बीमारी से जूझ रहे थे, जबकि स्वेतलाना टांसिल के आपरेशन के लिए अस्पताल गई थीं। पहली नजर में ही दोनों एक-दूसरे के प्यार में गिर गए। ब्रजेश सिंह के व्यक्तित्व और उनकी सौम्यता ने स्वेतलाना को काफी प्रभावित किया। वह उनकी दीवानी हो गईं।
मोहब्बत इस कदर जवां हुई कि दोनों को एक दूसरे के बिना जीना गंवारा नहीं था, लेकिन तत्काल सोवियत संघ की सरकार ने शादी की अनुमति नहीं दी। बावजूद इसके दोनों पति-पत्नी की तरह ही रहते थे। तीन साल से भी अधिक समय तक दोनों साथ रहे। अक्तूबर 1966 में रूस में ही ब्रजेश सिंह की बीमारी के चलते मौत हो गई। साथ रहते हुए उन्होंने स्वेतलाना को बताया था कि हिंदू धर्म में मरने के बाद व्यक्ति की अस्थियां गंगा में प्रवाहित की जाती हैं। ब्रजेश सिंह की मौत के बाद रूस में उनका शव हिंदू रीति-रिवाजों के मुताबिक जलाया गया।
इसके बाद स्वेतलाना ने तय किया कि वह उनकी अस्थियां गंगा में प्रवाहित करेंगी। दिसंबर 1966 में विशेष अनुमति लेकर स्वेतलाना ब्रजेश सिंह की अस्थियों के साथ भारत आईं। वह सीधे कालाकांकर राजभवन पहुंचीं। राजपरिवार ने उन्हें पूरा सम्मान दिया। राजभवन के लोगों के साथ राजभवन के किनारे गंगा में उन्होंने ब्रजेश सिंह की अस्थियों की विसर्जित किया।

दो महीने से ज्यादा रहीं कालाकांकर में
कालाकांकर राजघराने के कुंवर ब्रजेश सिंह से स्वेतलाना को इस कदर लगाव था कि वह कालाकांकर आने के बाद यहां से जाना नहीं चाहती थीं। उनकी इच्छा यहीं रहने की थी, लेकिन सरकार ने इसकी इजाजत नहीं दी। करीब दो महीने से ज्यादा समय तक वह कालाकांकर में रहीं। पंडित मदन मोहन मालवीय कॉलेज कालाकांकर के रिटायर्ड क्लर्क 70 वर्षीय एमएल गुप्ता बताते हैं कि स्वेतलाना राजभवन के प्रकाश गृह में रहती थीं। उनके कालाकांकर प्रवास के दौरान इंदिरा गांधी भी एक बार यहां आई थीं। स्वेतलाना स्कर्ट और ब्लाउज पहनती थीं। छोटे गोल्डेन कलर के बाल थे।

डॉ. कृष्ण कुमार लाल ने सिखाई हिंदी
स्वेतलाना को सिर्फ ब्रजेश सिंह से लगाव नहीं था, बल्कि उनकी वेशभूषा, परंपरा, रीति-रिवाज और उनकी भाषा से भी मोहब्बत थी। कालाकांकर में उनकी अस्थियां विसर्जित करने के बाद जब वह यहां रुकीं तो उन्हें हिंदी सीखने की भी ठान ली। एमएल गुप्ता बताते हैं कि मदन मोहन कॉलेज के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष डॉ. कृष्ण कुमार लाल ने स्वेतलाना को हिंदी सीखने में मदद की। वह प्रतिदिन शाम को पांच बजे राजभवन जाकर स्वेतलाना को हिंदी सिखाते थे। हर दिन करीब एक घंटे तक क्लास चलती थी। स्वेतलाना नियमित रूप से गंगा घाट और पोस्टआफिस जाती थीं।

ब्रजेश सिंह के नाम से बनवाया अस्पताल
स्वेतलाना भारत में अपने प्रेम की अमिट छाप छोड़ गईं। प्रियतम ब्रजेश सिंह की याद में उन्होंने कालाकांकर में अस्पताल शुरू कराया। भारत से अमेरिका जाने के बाद स्वेतलाना ने अस्पताल के निर्माण के लिए फंड भेजा। उन्होंने अपनी किताब ‘ट्वंटी लेटर्स टू ए फ्रेंड’ से मिलने वाली रायल्टी भी अस्पताल के निर्माण के लिए भेजी। स्वेतलाना की मदद से ब्रजेश की याद में 35 बेड के अस्पताल का निर्माण कराया गया। मई 1969 में हिंदी के महान कवि सुमित्रा नंदन पंत ने इस अस्पताल का शिलान्यास किया। हालांकि अब इस अस्पताल की जगह पर स्कूल संचालित हो रहा है।

तत्कालीन पीएम ने चेताया, पति के साथ चिता जल जाती हैं भारतीय महिलाएं
सोवियत संघ में ब्रजेश की मौत के बाद स्वेतलाना ने तय कर लिया कि वह उनकी अस्थियां गंगा में ही प्रवाहित करेंगी। इसके लिए उन्होंने भारत आने का प्रयास शुरू किया। तब सोवियत संघ के नेताओं ने स्वेतलाना को ऐसा न करने के लिए मनाने की काफी कोशिश की थी। कहा जाता है कि उस समय के सोवियत प्रधानमंत्री अलेक्सी कोसिगिन ने उनसे कहा था कि वह जोखिम ले रही हैं, क्योंकि कट्टर हिंदुओं में विधवाओं को मृत पति के साथ जलाने की परंपरा है, लेकिन जिद पर अड़ीं स्वेतलाना भारत पहुंच गईं।

भारत से अमेरिका जाकर ली शरण
स्वेतलाना को सरकार ने देश में रहने के लिए मंजूरी नहीं दी थी। इस पर वह कालाकांकर से दिल्ली पहुंचीं। वह सोवियत दूतावास में ठहरी हुई थीं। यहां से उन्होंने अमेरिका में शरण लेने की ठानी। इसके लिए वह अमेरिका दूतावास में जाकर राजदूत चेस्टर बॉवल्स से मिलीं। अमेरिका उस समय सोवियत संघ से भागे हर व्यक्ति को शरण देता था। राजदूत ने एक अधिकारी के साथ स्वेतलाना को रोम की एक फ्लाइट में सवार होने के लिए एयरपोर्ट भेज दिया। फिर वहां से वह अमेरिका पहुंच गईं।

मां के आत्महत्या करने के बाद स्टालिन से करने लगीं नफरत
स्वेतलाना का स्कूली जीवन स्टालिन के विशाल व्यक्तित्व के साथ गुजरा। जब उनकी मौत हुई तब वह लारा पीटर्स थीं। इससे पहले उनका नाम स्वेतलाना अलिलुयेवा था और उससे भी पहले वह स्वेतलाना लोसिफोवना स्टालिन के नाम से जानी जाती थीं। वह सोवियत संघ पर 1922 से 1953 तक शासन करने वाले जोसेफ स्टालिन की इकलौती बेटी थीं। स्टालिन के दो बेटे थे, लेकिन वह उनकी खास थीं। स्टालिन उन्हें नन्हीं बुलबुल या छोटी तितली कहकर बुलाते थे। स्वेतलाना साढ़े छह साल की थीं जब उनकी मां ने आत्महत्या की थी। 16 साल की उम्र में जब उन्हें अपनी मां की मौत के कारणों का पता चला तब उनके मन में पिता के खिलाफ गहरी नफरत पैदा हो गई। मास्को यूनिवर्सिटी में इतिहास की पढ़ाई करने के दौरान वह ग्रिगोरी मोरोजोफ से मिलीं। जिससे उन्होंने शादी कर ली। 19 साल की उम्र में उन्होंने एक बच्चे को जन्म दिया। जिसका नाम उन्होंने जोसेफ रखा। 1947 में स्वेतलाना और गिग्रोरी का तलाक हो गया। इसके बाद वह फिर अपने पिता के पास लौट गईं। भारत से अमेरिका जाने के बाद 1970 में उन्होंने प्रतिष्ठित अमेरिकी वास्तुकार वेस्ले पीटर्स से शादी कर ली। 1971 में बेटी ओल्गा को जन्म दिया। 1978 में उन्हें अमेरिका की नागरिकता मिली। इस समय तक उनका पीटर्स से तलाक हो चुका था। वो बेटी ओल्गा के साथ न्यू जर्सी चली गईं। 22 नवंबर 2011 को 85 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। बेटी ओल्गा ने उनका अंतिम संस्कार किया।
 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
  • Downloads

Follow Us