यात्रियों की संख्या सीमित होती तो न होती इतनी तबाही

सुधाकर भट्ट Updated Fri, 05 Jul 2013 09:24 AM IST
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इस बार की तबाही से यह बात भी साफ हो रही है कि चारधाम यात्रा पर आने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या सीमित करना बेहद जरूरी है। साथ ही यात्रियों की पूरी जानकारी के लिए पंजीकरण व्यवस्था भी करनी होगी।
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चारधाम आने वालों की संख्या हर साल बढ़ रही है। 2006 से 2012 के बीच महज छह साल के अंतराल में यात्रियों की संख्या दोगुनी हो चुकी है। इस बार भी प्रदेश करीब तीन करोड़ लोगों के आने का अनुमान था। इसमें से करीब 50 लाख यात्री चारधाम यात्रा में शामिल होते।

तेजी से बढ़ रहा दबाव
यात्री बढ़ने से चारधाम के साथ ही यात्रा रूट के तमाम छोटे-बड़े कस्बों पर तेजी से दबाव बढ़ रहा है। पंजीकृत होटल, गेस्ट हाउस, धर्मशालाओं की संख्या बेहद सीमित है। होटलों और धर्मशालाओं में जगह न मिलने पर तमाम यात्री अपने वाहनों में ही रात गुजारते हैं। पूरे यात्रा रूट पर वाहनों, बेहिसाब और अनियोजित निर्माण का दबाव या तो पहाड़ झेलते हैं या फिर नदियां।

पर्यावरण संतुलन के लिहाज से यह खतरनाक साबित होता है। केदारनाथ और बदरीनाथ की घाटी में इस बार तबाही से यह साबित भी हो रहा है। यात्रा रूट पर अधिकतर स्थानों पर नदियों की सीमा का अतिक्रमण है। इस आपदा का एक सबक यह भी है कि यात्रियों का रिकार्ड रखना बहुत जरूरी है।

गाहे-बगाहे अमरनाथ और वैष्णो देवी की तर्ज पर चारधाम आने वाले यात्रियों के पंजीकरण का राग तो अलापा जाता रहा है पर इसे लागू करने पर कभी भी गंभीरता से काम नहीं किया गया। नतीजा यह है कि आपदा के 18 दिन रोज बाद भी यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि आखिरकार कितने यात्री लापता हुए और कितने काल का ग्रास बन गए।

पड़ रहा चौतरफा दवाब
एक रिपोर्ट के मुताबिक एक समय में पूरे यात्रा मार्ग पर 74 हजार लोगों के रहने की व्यवस्था है। पर सीजन में दो लाख से अधिक यात्री एक ही समय में अलग-अलग पड़ावों पर होते हैं। इसका सीधा प्रभाव बिजली, पानी, परिवहन आदि की व्यवस्था पर अत्यधिक दबाव के रूप में सामने आता है। इन हालात में मांग और आपूर्ति की व्यवस्था गड़बड़ा जाती है।

इसका खामियाजा यात्रियों को ही भुगतना पड़ता है। यात्रा कर चुके लोग जानते हैं कि इसका क्या मतलब होता है। एक बात और। वाहनों के बढ़ते दवाब से चारधाम यात्रा सीजन में सड़क दुघर्टनाएं भी बढ़ रही हैं।  

ये हैं रुकने के इंतजाम - इकाई - कमरे
क्लासिफाइड होटल - 13 - 649
अन्य होटल - 949 - 17085
पर्यटक आवास गृह - 95 - 1283
गेस्ट हाउस/लॉज - 388 - 3943
धर्मशाला - 68 - 3882
अन्य - 80 - 344
कुल - 1593 - 27186 (कुल बिस्तर-74734)

पैटर्न में भी हो रहा बदलाव
बदलाव इशारा कर रहा है कि चारधाम यात्रा अब सिर्फ आस्था तक ही सीमित नहीं रह गई है। बल्कि आने वाले इसे आउटिंग, सैर-सपाटा और पारिवारिक पिकनिक के रूप में भी ले रहे हैं। यात्रा पर आने वालों का आयु वर्ग 45 से 60 के बीच का था। अब यह 25 से 35 आयु वर्ग में ज्यादा प्रचलित हो रहा है।

पर्यटन विभाग की एक रिपोर्ट के मुताबिक हेमकुंड साहिब के लिए यही वर्ग सबसे अधिक संख्या में निकलता है। हेमकुंड साहिब जाने वाले यात्री बदरीनाथ की ओर भी रुख करते हैं। एक अहम बात यह भी है कि चारधाम यात्रा के दौरान मसूरी, धनौल्टी, औली जैसे टूरिस्ट डेस्टिनेशन भी खूब आबाद रहते हैं।

ये हैं आने वाले यात्री
आयु वर्ग प्रतिशत
0-9 - 4.75
10-14 - 1.78
15-24 - 17.52
25-34 - 32.48
35-44 - 13.44
45-54 - 16.24
55-59 - 7.33
60+ - 6.34
(श्रोत-उत्तराखंड टूरिज्म डेवलपमेंट प्लान 2007-2022)

कैलाश मानसरोवर यात्रा में भी तो यात्रियों की संख्या होती है। अमरनाथ यात्रा में भी यही किया जाता है। केदारनाथ तक पैदल रास्ता है और यात्री की फिटनेस जरूरी है। फिर क्यों यात्रियों की संख्या बेहिसाब बढ़ने दी जाती है। कुछ समय पहले यह तथ्य सामने आया था कि कांवड़िये गोमुख तक पहुंच रहे हैं। मैदान और पहाड़ की ड्राइविंग में खासा अंतर है। सारा मामला प्रशासनिक क्षमता और क्रियान्वन का है। सख्ती होगी तो सब ठीक हो जाएगा।
-डा. आरएस टोलिया, पूर्व मुख्य सचिव, उत्तराखंड
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