याचिकाकर्ताओं को प्रतिशपथपत्र पेश करने के निर्देश, पांच हेक्टेयर से कम में फैले वनों को वन न मानने का मामला

Haldwani Bureauहल्द्वानी ब्यूरो Updated Thu, 29 Oct 2020 02:14 AM IST
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प्रतीकात्मक फोटो।
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नैनीताल। हाईकोर्ट ने पांच हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल में फैले वनों को वनों की श्रेणी से बाहर रखने के मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद याचिकाकर्ता को प्रतिशपथपत्र दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए दीपावली के बाद की तिथि नियत की है।
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कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवि मलिमठ एवं न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार नैनीताल के पर्यावरणविद प्रो. अजय रावत और अन्य ने हाईकोर्ट में अलग-अलग जनहित याचिकाएं दायर कर कहा था कि सरकार ने 19 फरवरी 2020 को एक नया आदेश जारी कर पांच हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल वाले वनों को वनों की श्रेणी से बाहर कर दिया। इससे पहले भी सरकार ने 10 हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल वाले वनों को वन नहीं माना था जिस पर कोर्ट ने रोक लगा दी थी लेकिन बाद में सरकार ने अपने आदेश में संशोधन कर इसे 10 से पांच हेक्टेयर कर दिया, जो वन अधिनियम के विरुद्ध है।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि फॉरेस्ट कन्जर्वेशन एक्ट 1980 के अनुसार प्रदेश में 71 प्रतिशत वन क्षेत्र घोषित है, जिसमें वनों की श्रेणी को भी विभाजित किया गया है। इसके अलावा, कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं, जिन्हें किसी भी श्रेणी में नहीं रखा गया है। याचिकाकर्ताओं की मांग है कि इन क्षेत्रों को भी वन क्षेत्र की श्रेणी में शामिल किया जाए ताकि इनका दोहन या कटान न हो सके। याचिका में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने 1996 के गोडा वर्मन बनाम केंद्र सरकार के आदेश में कहा है कि कोई भी वन क्षेत्र चाहे उसका मालिक कोई भी हो, उसे वन क्षेत्र के श्रेणी में रखा जाएगा और वनों का अर्थ क्षेत्रफल या घनत्व से नहीं है। विश्वभर में जहां भी 0.5 प्रतिशत क्षेत्र में पेड़ पौधे है या उनका घनत्व 10 प्रतिशत है, उन्हें वनों की श्रेणी में रखा गया। सरकार के इस आदेश पर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार ने कहा कि प्रदेश सरकार वनों की परिभाषा न बदले। उत्तराखंड में 71 प्रतिशत वन होने के कारण नदियों व सभ्यताओं का अस्तित्व बना हुआ है। पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए दीपावली के बाद की तिथि नियत की।
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