इस्लामिक स्टेट के खतरे के कारण अफगानी सिख व हिंदू छोड़ रहे हैं अपने जन्मस्थान 

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल Updated Sun, 27 Sep 2020 06:30 PM IST
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Afghan Hindu and Sikh families
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लगातार बढ़ रहे इस्लामिक स्टेट के खतरे के कारण अफगानी सिख और हिंदू अपने जन्मस्थान को छोड़ रहे हैं। कभी हिंदू और सिख अफगान समाज का समृद्धि हुआ करता था लेकिन आज मुट्ठीभर ही बचे हैं। अफगानिस्तान में कभी दो लाख 25 हजार हिंदू और सिख परिवार थे। अब 700 रह गए हैं। 
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बहुसंख्यक मुस्लिम देश में गहरे भेदभाव के कारण समुदाय की संख्या में वर्षों से कमी आ रही है। अफगानिस्तान के सिख और हिंदू अक्सर इस तरह के हमलों से दो-चार हो रहे हैं। तेजी से कट्टर इस्लामिक होते जा रहे अफगानिस्तान में इस तरह के हमले आम हो रहे हैं और अल्पसंख्यकों की मुश्किलें बढ़ रही हैं।
अपने जन्मस्थान को छोड़ने को लेकर वहां के छोटे समुदाय के एक सदस्य हमदर्द ने कहा, 'हम अब यहां नहीं रह पा रहे हैं।' हमदर्द ने कहा कि उसकी बहन, भतीजों और दामाद सहित उसके सात रिश्तेदारों को इस्लामिक स्टेट के बंदूकधारियों ने मार्च में समुदाय के मंदिर पर हमले में मार दिया था, जिसमें 25 सिख मारे गए थे।

गौरतलब है कि तालिबान ने 1996 और 2001 के बीच अफगानिस्तान पर शासन किया। हालांकि सत्ता से बेदखली और विद्रोह शुरू करने से पहले तालिबान ने देश में सख्त इस्लामिक शरिया कानून लागू किया। तब सार्वजनिक तौर पर लोगों को कत्ल किया जाता था। लड़कियों के स्कूल जाने पर पाबंदी थी। हिंदुओं और सिखों पर भी सख्ती थी। उन्हें पीले पट्टे पहनने पड़ते थे ताकि उन्हें पहचाना जा सके।

तालिबान ने सत्ता पर काबिज होते ही शरिया और इस्लामिक कानून को सख्ती से लागू किया। संगीत, टीवी और पतंग उड़ाने जैसे कार्यो पर प्रतिबंध लगा दिया गया। लड़कियों के स्कूल बंद कर दिए गए, जबकि महिलाओं को काम करने से रोक दिया गया। साथ ही बेहद सख्त और क्रूर सजाएं दी गई।

इसी साल मार्च के महीने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में एक गुरुद्वारे पर आतंकवादी हमला हुआ था। हमले के समय गुरुद्वारे में तकरीबन 150 लोग मौजूद थे। इनमें कई बच्चे भी थे। हमले में कम-से-कम 25 लोग मारे गए थे। इस्लामिक स्टेट ने इस हमले की जिम्मेदारी ली थी। दो साल पहले एक आत्मघाती हमलावर ने राष्ट्रपति अशरफ घनी से मिलने जा रहे सिखों और हिंदुओं के काफिले को निशाना बनाया था और जलालाबाद में 19 लोगों की मौत हो गई थी। मारे गए लोगों में 10 सिख और सात हिंदू थे।

हाल ही में अफगानिस्तान में गुरुद्वारे पर हमले के बाद 180 सिख परिवारों का एक जत्था दिल्ली पहुंचा था। इससे पहले अगस्त में 176 अफगान सिखों और हिंदुओं का एक समूह विशेष वीजा पर भारत आया था। बता दें कि अफगानिस्तान में सिख और हिंदू की स्थिति काफी दयनीय हो गई है। लोगों का दिन डर और अकेलेपन के साथ गुजरता है। अगर आप मुसलमान नहीं हैं, तो उनकी नजरों में आप इन्सान नहीं हैं।

सरकार कहती है, शांति होगी तो लौट आएंगे सिख-हिंदू
पिछले महीने राष्ट्रपति अशरफ गनी के प्रवक्ता सेदिक सिद्दीकी ने बयान जारी किया कि अफगानिस्तान में सिख और हिंदू लौट आएंगे अगर यहां शांति कायम होगी। सरकार दावा करती है कि उनकी सुरक्षा के लिए पूरे इंतजाम किए जाएंगे। हालांकि वह नहीं बता पाती कि क्या इंतजाम होंगे?

प्रमुख घटनाएं : इस तरह हुआ विनाश
  • 80 के दशक में सोवियत युद्ध के समय अधिकतर सिख भारत आ गए, उस समय यहां उनकी सं या दो लाख थी। हिंदू भी बड़ी सं या में पलायन को मजबूर हुए।
  • 90 के दशक में तालिबानी शासन आया, हिंदू व सिखों को अलग पहचान दिखाने के लिए बांह पर पीला कपड़ा बांधने को कहा गया
  • 1992 में नजीबुल्लाह का शासन खत्म होने के साथ सिखों व हिंदुओं का पलायन फिर से हुआ
  • 1992-96 के दौरान विभिन्न धड़ों के बीच युद्ध में काबुल के हिंदू मंदिर नष्ट किए गए
  • 2013 तक संख्या 800 परिवारों तक सीमित हो गई
  • 2018 में जलालाबाद में आईएस के फिदायीन हमले में 19 लोग मारे गए। इनमें संसद के लिए नामित एक सिख नेता सहित अधिकतर सिख थे।
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