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ओली और प्रचंड फिर आमने-सामने, पार्टी नेताओं ने विवाद सुलझाने के लिए पत्र लिखा

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 30 Jul 2020 06:10 PM IST

सार

  • 152 सदस्यों ने ओली और प्रचंड को लिखा पत्र, केंद्रीय समिति की बैठक तत्काल बुलाएं
  • दोनों नेताओं के रवैये से पार्टी की छवि हो रही है खराब, ओली अब भी ले रहे हैं एकतरफा फैसले
  • ओली ने फिर से स्थगति की स्थाई समिति की बैठक, मनाने पर भी नहीं आए  
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KP sharma OLI and Pushp Kamal Dahal
KP sharma OLI and Pushp Kamal Dahal - फोटो : File Photo

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कहते हैं कि सियासत में दिखता कुछ और है और होता कुछ और। ऐसा ही कुछ चल रहा है लंबे समय से एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोले नेपाल की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के दोनों अध्यक्षों के बीच। कभी इस्तीफे की मांग, कभी समझौता, कभी सुलह की कोशिशें, कभी अलग पार्टी बनाने की धमकी और कभी फिर से साथ चलने की कवायद।
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प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने भले ही अपनी पार्टी के सह अध्यक्ष प्रचंड को कुछ वक्त के लिए मना लिया हो कि वो उनका इस्तीफा मांगना बंद करें, लेकिन ओली को लेकर प्रचंड खेमे की नाराजगी कम होती नहीं दिख रही। खासकर ओली के अड़ियल रवैये और एकतरफा फैसलों को लेकर। महज दस दिनों बाद ही एक बार फिर ओली और प्रचंड आमने-सामने हैं। इस बार फिर मुद्दा पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक को लेकर फंसा है।


पिछली बार जब ओली और प्रचंड के बीच बैठक हुई और कई घंटे के बाद दोनों नेताओं के बीच कुछ समझौते हुए, दिसंबर में पार्टी अधिवेशन बुलाने का फैसला हुआ और ओली ने प्रचंड को यह कहकर शांत किया कि दिसंबर में वही पूरी तरह पार्टी के मुखिया होंगे, जैसे चाहेंगे, वैसे पार्टी चलाएंगे और ओली केवल प्रधानमंत्री ही रहेंगे, तो लगा जैसे विवाद कुछ दिनों के लिए थम गया।

ये भी तय हुआ कि 28 जुलाई को पार्टी की स्थाई समिति की बैठक में तमाम मुद्दों पर चर्चा करके इसे पार्टी की मुहर लगवा दी जाएगी, लेकिन ओली का रवैया इसके बाद भी बदला नहीं। आखिरकार ओली ने फिर एकतरफा फैसला लेकर बैठक स्थगित करने का एलान कर दिया।

दोनों नेताओं के इस आपसी तकरार और सत्ता संघर्ष से नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के दूसरे सभी नेता बेहद नाराज भी हैं और इसे पार्टी के लिए बेहद नुकसानदेह मान रहे हैं। एनसीपी की केंद्रीय समिति के 449 सदस्यों में से 152 ने दोनों नेताओं (पार्टी का अध्यक्ष पद ओली और प्रचंड दोनों के ही पास है) को चिट्ठी लिखी है और बैठक जल्दी से जल्दी बुलाने की मांग की है।

चिट्ठी में नेताओं ने लिखा है कि पार्टी दोनों नेताओं के टकराव और विवाद को लेकर चिंतित है और हर मुद्दे पर पार्टी के तय नियमों के अनुसार बैठक में चर्चा की मांग करती है।

इन 152 नेताओं में गोपाल ठाकुर भी हैं। वह बताते हैं कि प्रचंड और ओली अपने बीच के अंतर्विरोधों और महत्वाकांक्षाओं को खुद कई दौर की बैठकों के बाद भी दूर नहीं कर सके, ऐसे में इसे पार्टी फोरम पर ही हल किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि पार्टी हमेशा से साझा तरीके से समस्याएं हल करती रही है, लेकिन ओली किसी की नहीं सुनते और एकतरफा फैसले थोपते हैं।

स्थाई समिति की बैठक कई बार स्थगित किए जाने से ये साफ संदेश जाता है कि पार्टी कोई भी फैसला नहीं ले सकती। ओली ने पार्टी में डेडलॉक की स्थिति पैदा कर दी है, जबकि केंद्रीय समिति के सभी सदस्य ये जानना चाहते हैं कि सरकार कोविड-19 को फैलने से रोकने में नाकाम क्यों रही, तमाम मोर्चों पर असफल क्यों रही है और स्वास्थ्य किट इतने महंगे दामों में क्यों खरीदे गए।

एक अन्य नेता रामकुमारी झांकरी ने भी पार्टी की एकता के लिए बैठक बुलाए जाने की मांग करते हुए कहा कि पार्टी में डेडलॉक की स्थिति देश में सरकार के कामकाज को भी प्रभावित कर रही है जिसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ रहा है। उन्होंने कहा है कि जब पार्टी की केंद्रीय समिति के 25 फीसदी लोगों ने बैठक बुलाने की मांग की है, तो नियमों के मुताबिक इसे हर हाल में एक महीने के भीतर बुलाना चाहिए।   

28 तारीख को बुलाई गई स्थाई समिति की बैठक बेशक ओली ने अचानक रद्द कर दी हो, लेकिन कई सदस्य बैठक के लिए पहुंच चुके थे और ओली के इस फैसले से नाराज भी थे। उन्होंने दबाव डालकर प्रचंड को ओली के पास भेजा भी और बैठक में आने को कहा, लेकिन ओली तैयार नहीं हुए।

हालांकि अब प्रचंड खुलकर ओली के खिलाफ नहीं बोल रहे हैं, लेकिन उनके करीबी माधव कुमार नेपाल और झालानाथ खनाल ने इसे लेकर अपनी नाराजगी का इजहार किया है और उनका गुस्सा अब कहीं न कहीं प्रचंड के खिलाफ भी झलक रहा है।

जाहिर है, ये तमाम स्थितियां नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर काफी उथल-पुथल के संकेत दे रही हैं और तमाम लोगों को ये आशंका है कि दोनों नेताओं की वजह से कहीं पार्टी अपने मूल चरित्र और चिंतन से दूर न हो जाए और इसे फिर से कहीं टूट का संकट न झेलना पड़े।

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