ब्रेक्जिट के फैसले का ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा असर

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Updated Sat, 23 Jun 2018 08:26 PM IST
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Brexit decision effects appear on Britain economy

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ब्रिटेन के पूरी तरह से यूरोपीय संघ (ईयू) से बाहर होने के बाद उसकी क्या स्थिति होगी यह तो अभी स्पष्ट नहीं है लेकिन ब्रिटेन के ईयू से बाहर होने के फैसले का असर उसकी अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है। ब्रिटेन के घर - परिवार गरीब हो रहे हैं , कंपनियां निवेश को लेकर अधिक सतर्कता बरत रही हैं और प्रॉपर्टी बाजार ठंडा पड़ गया है। 
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यूरोपीय संघ (ईयू) से बाहर जाने के पक्ष में हुये मतदान के बाद पिछले दो वर्ष में, ब्रिटेन की आर्थिक वृद्धि की गति धीमी पड़ी है, जबकि इससे पहले ब्रिटेन दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के लिये वृद्धि का अगुवा हुआ करता था। ब्रिटेन 29 मार्च 2019 को यूरोपीय संघ से आधिकारिक रूप से अलग हो जायेगा। ईयू से नाता टूट जाने के बाद उसके साथ ब्रिटेन का किस तरह का संबंध होगा इसको लेकर अनिश्चतता बनी हुई है। इससे चीजें और ज्यादा बिगड़ रहीं हैं। 


ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे की सरकार अभी भी यूरोपीय संघ के साथ कैसे संबंध होने चाहिए , इस पर बंटी हुई है। कुछ लोग ईयू के साथ " कड़े संबंध-विच्छेद" के पक्ष में है , जो कि ब्रिटेन को ईयू के मुक्त व्यापार संघ से पूरी तरह अलग कर देगा और दुनियाभर में उसे देशों के साथ नये व्यापारिक समझौते करने की अधिक आजादी देगा। 

दूसरी तरफ कुछ लोग इस पक्ष में है कि ब्रिटेन को जितना संभव हो यूरोपीय संघ के साथ करीबी संबंध रखने चाहिए। इसका यह तात्पर्य भी हो सकता है कि ब्रिटेन को ईयू के नियमों का पालन करना चाहिये। 

वहीं , दूसरी ओर एयरबस समेत बड़ी कंपनियों ने व्यापारिक संबंधों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने के चलते देश छोड़ देने की धमकी दी है। इस कंपनी में ब्रिटेन के 14,000 लोग काम करते हैं। 

सांसद डैरेन जोन्स ने कहा कि ब्रेक्जिट वार्ताओं के मामले सरकार ने जिस तरह की अनिश्चित स्थिति बनाई है उसकी वजह से हजारों कुशल लोगों की नौकरियों पर संकट मड़राने लगा है। 

जून 2016 के जनमत संग्रह से पहले ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था वर्षों तक दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं में से एक थी। अब इसमें बहुत मुश्किल से बढ़ोतरी हो रही है। इस वर्ष की पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था इसके पिछले तिमाही से सिर्फ 0.1 प्रतिशत बढ़ी है। यह पिछले पांच वर्षों में सबसे कम दर है। 

इसके अलावा पौंड में भी गिरावट आई है। जून 2016 के जनमत संग्रह के बाद पौंड 15 प्रतिशत गिरा है। इससे उपभोक्ताओं और कंपनियों के लिए आयात महंगा हो गया है।

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