पाकिस्तान: मुफ्ती का कोर्ट, 3 पेशियों में फैसला

बीबीसी उर्दू संवाददाता/सबा एतजाज, लाहौर Updated Tue, 17 May 2016 05:58 PM IST
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शरिया अदालत
शरिया अदालत - फोटो : bbc

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सार

  • मुफ्ती कवी की यह अदालतें पूरे देश में चल रही हैं
  • तीन पेशियों में हम मामले को समेट देते हैं
  • मध्यस्थता अदालतों की पाकिस्तान के संविधान में कोई गुंजाइश नहीं है

विस्तार

मुफ्ती अब्दुल कवी धार्मिक विद्वान हैं लेकिन साथ ही वे जज भी हैं और जाँचकर्ता भी। पंजाब प्रांत के शहर मुल्तान में उनके 'अदालती कमरे' के बाहर एक बड़ा साइन बोर्ड लगा है जिस पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा है 'इस्लामी अदालत'। मुफ्ती कवी की 'अदालत' के बाहर बेंच पर मुद्दइयों की कतारें लगी रहती हैं। तलाक से संबंधित मामले की सुनवाई के लिए आए एक वादी ने कहा, 'हम सरकारी अदालत में नहीं जाना चाहते, वहाँ समय लगता है और बदनामी होती है। मुफ्ती साहब की अदालत में हमारा फैसला शरीयत और इस्लामी कानून के अनुसार होगा।'
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मुफ्ती कवी की यह अदालतें पूरे देश में चल रही हैं जिनमें लाहौर और इस्लामाबाद जैसे बड़े शहर शामिल हैं। मुफ्ती का कहना है कि वे पिछले 17 सालों में तीन हजार से अधिक मुकदमों का फैसला सुना चुके हैं जिनमें सिविल और स्वामित्व के विवाद से लेकर पारिवारिक मुकदमे और जबरन बाल विवाह के मामले शामिल हैं। मुफ्ती साहब के अनुसार वह पाकिस्तान के संविधान और क़ानून और शरीयत कानून दोनों को ध्यान में रखते हुए फैसला देते हैं। मुफ्ती साहब के अनुसार फैसलों पर अमल करवाने के लिए वह अपने व्यापक और प्रभावशाली नेटवर्क की मदद लेते हैं जिसमें क्षेत्रों के संघ पार्षद और बड़े जमींदार उनसे सहयोग करते हैं।
'यह बात तो जज साहब भी मानते हैं कि हमारे देश की न्यायिक प्रणाली महंगी है और लोगों का बहुत समय बर्बाद होता है। हमारी प्रणाली बिल्कुल मुफ्त है और तीन पेशियों में हम मामले को समेट देते हैं।' जहां एक तरफ क़ानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रकार की मध्यस्थता अदालतों की पाकिस्तान के संविधान और कानून में कोई गुंजाइश नहीं है। वहाँ वह यह भी मानते हैं कि देश की मौजूदा न्यायिक प्रणाली में न्याय हासिल करना धीमा और महंगा है जो कि शायद लोगों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने पर मजबूर कर रहा है। 
लेकिन क़ानूनी विशेषज्ञ कहते हैं कि राज्य का अधिकार किसी ख़ास व्यक्ति या संस्था के हाथ में जाना एक ख़तरनाक बात है। सुप्रीम कोर्ट के वकील मियां नामान ने कहा, 'इस तरह तो कोई भी व्यक्ति उठकर अपनी अदालत बना लेगा, अपनी पुलिस बना लेगा। न्यायिक प्रणाली में अगर खामियां हैं तो उन्हें ठीक करना भी राज्य का ही काम है। अगर समानांतर व्यवस्था बना दी गई तो शासन नहीं चल सकता।' 
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जमात-उद-दावा की भी चलाती है अपनी अदालत

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