शरिया क्लास नहीं ली तो मिली सजा-ए-मौत

माइक थॉमसन/बीबीसी संवाददाता Updated Fri, 11 Mar 2016 02:54 PM IST
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शरिया क्लास नहीं ली तो मिली सजा-ए-मौत
शरिया क्लास नहीं ली तो मिली सजा-ए-मौत - फोटो : BBC

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हमने सोचा कि अपना अनिवार्य शरिया कोर्स हमने पूरा कर लिया है। लेकिन तभी पता चला कि हमें अभी भी मस्जिद में रात में लगने वाली कक्षा में जाना होगा। अधिकांश दुकानदारों ने भी ऐसा ही किया, यही वजह है कि रक्का की अधिकांश दुकानें बंद हो जाती हैं। मेरा दोस्त इस कक्षा में नहीं आया। जब इस्लामिक स्टेट के एक सदस्य ने उसके बारे में खोजबीन की तो हमने कहा कि वो बीमार है।
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बाद में हमने सुना कि उन्होंने उसके घर पर छापा मारा था, लेकिन वो वहां नहीं मिला। अब हमने एक सप्ताह लम्बे कोर्स को समाप्त कर लिया था और आधिकारिक रूप से हम फिर से इस्लाम में शामिल हुए, जैसे दोबारा मुस्लिम बने हों। अगले दिन मैं बहुत आत्मविश्वास के साथ काम पर गया। आईएस के एक आदमी ने मुझे रोका और पूछा कि क्या मैंने शाम की नमाज़ पढ़ी है। मेरा जवाब था, "हां, क्यों नहीं।"
लेकिन उसने सोचा कि मैं झूठ बोल रहा हूँ। तसल्ली के लिए उसने पूछा, "क़ुरान का कौन सा हिस्सा पढ़ा है?" डायरी का दूसरा हिस्साः '...पत्थर मार-मार कर औरत की जान ले लो' मेरी जान तब जाकर बची जब एक महिला पास से गुज़री जिसने अपनी आंखों को ठीक तरह से ढका नहीं था। वो आदमी मुझे छोड़कर उससे पूछताछ करने भागा। इसके बाद तो जितना हो सकता था उतनी तेज़ी से मैं उस दुकान की ओर भागा, जहां मैं काम करता था। लेकिन मेरी हालत तब और ख़राब हो गई, जब मैं दुकान के अंदर पहुंचा। वहां मुझे बताया गया कि दो लोग आए थे और मेरे बारे में पूछताछ कर रहे थे। मैं घबरा गया और मेरे हाथ कांपना शुरू हो गए। मैंने पूछा कि वो कौन थे? दुकानदार ने कहा, "मैं नहीं जानता, लेकिन उनमें से एक के हाथ में बंदूक़ थी।"
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मैं सोचने लगा, क्या मुझे कोड़े पड़ेंगे या दाएश के साथ लड़ने के लिए मोर्चे पर भेजा जाएगा? मेरे दिमाग़ में पहला विचार भाग जाने का आया, लेकिन मैं जानता था कि वो जल्द ही मुझे ढूंढ लेंगे। मैं पूरे दिन उन दो लोगों के बारे में सोचते हुए बिताया, चिंता ये हो रही थी कि आगे क्या होगा। लेकिन मुझे खोजते हुए कोई नहीं आया....और जैसे ही दुकान बंद हुई मैं सीधे घर चला गया। मेरी मां ने पूछा, "क्या हो गया है तुम्हें? तुम इतने डरे हुए क्यों दिख रहे हो?" मां ने इन भावों को पकड़ लिया था।

मेरी भूख मर गई थी। मैं सोचने लगा कि जब दाएश के लोग मुझे लेने मेरे घर आएंगे तो मेरी मां कैसा बर्ताव करेगी। वो मुझसे लगातार पूछती रही कि मुझे कौन सा ग़म खाए जा रहा है, लेकिन मैंने कुछ भी जवाब नहीं दिया। मैं उसे भी चिंता में नहीं डालना चाहता था। मैं रातभर सो नहीं पाया और मुझे लगता है कि मेरी मां भी जगी रही। सुबह मैं जल्दी ही घर से निकला और दुकान खोलने चला गया। मैंने सोचा, मां के सामने से ले जाने की बजाय, बेहतर हो कि वो मुझे यहां से ले जाएं। एक लंबा हथियारबंद आदमी दुकान में आया। मैंने सोचा कि 'यही है।' लेकिन वो मुस्कराया और मुझे बताया कि इतनी चिंता करने की कोई बात नहीं। लेकिन मेरे दोस्त के बारे में अच्छी ख़बर नहीं थी। शरिया क्लास में न आने के लिए उसे मौत की सज़ा सुनाई गई थी। शुक्र है कि जो आदमी सामने आया था उसने उसे पहले ही चेता दिया था और दाएश के हाथ आने से पहले ही वो भाग निकला था।

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आज का दिन वाक़ई बहुत डरावना था। शाम को मैं मोहम्मद से मिलने गया। वो लगभग मेरे पिता की उम्र के हैं। हम साथ-साथ बैठे, मैंने पूछा कि क्या वो ऐसे नाज़ुक हालात में मेरी मदद कर सकते हैं।
उन्होंने बताया, "मौजूदा हालात की चिंता किए बिना अपनी ज़िंदगी जियो। सोचो कि तुम दो पहाड़ों के बीच बंधी एक रस्सी पर चल रहे हो। मौजूदा हालात नीचे की ज़मीन है। बिल्कुल नाक की सीध में चलते जाओ और ध्यान बस इस रास्ते को ख़त्म करने पर रहे। नीचे बिल्कुल मत देखो।" अब से मैं उनकी सलाह मानूंगा और बिल्कुल सामने देखकर चलने की कोशिश करूंगा।।।जब तक दूसरी तरफ़ के पहाड़ तक न पहुंच जाऊं। जब मैं वहां पहुंच जाऊंगा, ये वर्तमान भी बीत जाएगा।

(अल-शरकिया 24 के एक्टिविस्ट आइएस की कथित राजधानी रक़्क़ा में रह रहे हैं। अल-शरकिया 24 आइएस के कब्ज़े वाले स्थानों के हालात के बारे में दुनिया को बताने के लिए काम कर रहे समूहों में से एक है। यह स्टोरी बीबीसी संवाददाता माइक थॉमसन से इस एक्टिविस्ट की लंबी बातचीत पर आधारित है।)
 
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