बीते दशक पर एक नजर - दूसरा भाग

यूएन हिंदी समाचार Updated Sat, 28 Dec 2019 05:47 PM IST
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इबोला
इबोला - फोटो : UN Hindi News

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सार

अब जब वर्ष 2019 विदा होने के कगार पर है, आइए एक नजर डालते हैं साल 2010 और 2019 के बीच घटी विश्व की कुछ बड़ी घटनाओं पर। सदी के दूसरे दशक पर केंद्रित तीन हिस्सों वाली इस समीक्षा की दूसरी कड़ी में हम 2014 और 2016 के बीच हुई घटनाओं पर नजर डालेंगे जिनमें शामिल हैं: ईबोला का भयावह प्रकोप; ऐतिहासिक पेरिस जलवायु समझौते के माध्यम से विश्व नेताओं द्वारा जलवायु संकट से निपटने का प्रयास; और टिकाऊ विकास पर संयुक्त राष्ट्र के 2030 एजेंडा का शुभारंभ।

विस्तार

2014: ईबोला बीमारी का कहर

दिसंबर 2013 में गिनी के मेलियानडौ गांव में एमिल ओउमुनो नाम के एक बच्चे की मृत्यु हो गई। यह उसके परिवार के लिए तो एक त्रासदी थी ही, लेकिन इस बच्चे की मौत ने तब एक अलग आयाम ले लिया जब एमिल की पहचान पहले ईबोला रोगी के रूप में हुई। इसके बाद देखते ही देखते ईबोला ने पश्चिमी अफ्रीकी देशों को अपनी चपेट में ले लिया।
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ये खतरनाक, संक्रामक वायरस गिनी के साथ-साथ पड़ोसी देशों लाइबेरिया और सिएरा लियोन में भी फैल गया जिसे पश्चिमी अफ्रीका के ईबोला प्रकोप के रूप में देखा गया। इसके प्रकोप से तीन देशों की अर्थव्यवस्थाएं ध्वस्त होने के करीब पहुंच गईं और स्वास्थ्य सेवाएँ पर जबरदस्त बोझ पड़ा। उस वर्ष लगभग छह हजार मौतें दर्ज की गईं और स्थानीय समुदायों में ईबोला का भय फैल गया।
अगस्त 2014 तक विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक समन्वित अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई सुनिश्चित करने, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धनराशि एकत्र करने और दूसरे देशों में बीमारी फैलने से रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिन्ताजनक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल (PHEIC) की घोषणा कर दी थी। 
इस आपातकाल को हटाने में यूएन एजेंसी को दो साल लगे। इस दौरान गिनी, लाइबेरिया और सिएरा लियोन में इबोला के 28 हजार से ज्यादा मामले सामने आ चुके थे और 11 हजार से अधिक लोगों की मौत हो गई। 

स्वास्थ्य संगठन द्वारा स्वीकृत वर्ष 2016 की एक स्वतंत्र रिपोर्ट में कहा गया कि ईबोला के प्रकोप के अभूतपूर्व पैमाने को पहचानने में देरी हुई। साथ ही इस रिपोर्ट में स्वास्थ्यकर्मियों के लिए बेहतर प्रशिक्षण और स्वास्थ्य नेटवर्कों के बीच बेहतर संचार के महत्व पर प्रकाश डाला गया।

अफसोस की बात ये है कि वर्ष 2018 से अफ्रीका का एक और हिस्सा इबोला बीमारी की चपेट में आया हुआ है। कॉंगो लोकतांत्रिक गणराज्य में लगभग 3,300 मामलों की पुष्टि हो चुकी है और 2,200 जानें गई हैं। इस प्रकोप का केंद्र - देश का पूर्वी भाग, गंभीर असुरक्षा और हिंसा का भी सामना कर रहा है जिससे रोग की रोकथाम के प्रयासों में बाधा आ रही है।

बेनी क्षेत्र में यूएन एजेंसी की ईबोला पर काबू पाने का प्रयास कर रही टीम के एक तिहाई सदस्यों को सुरक्षा कारणों से अस्थायी रूप से स्थानांतरित करना पड़ा है जिससे वायरस के और अधिक फैलने की संभावना है।
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2015: जलवायु कार्रवाई के लिए नई उम्मीद

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